शलजम खाने के फायदे व नुकसान Turnip Shaljam Benefit Harm In Hindi

शलजम खाने के फायदे व नुकसान Turnip Shaljam Benefit Harm In Hindi

Turnip Shaljam Benefit Harm In Hindi

शलजम (Turnip) उस समय साइबेरिया में वन्य रूप में उगता था जब डायनोसोर्स धरती पर थे एवं शलजम को पहले निर्धनों एवं पालतू पशुओं के आहार के रूप में जाना जाता था। अपनी औषधीय उपयोगिता के कारण अब इसे वैश्विक पहचान मिलने लगी है। शलजम के कई रूप मिलते हैं जिनके स्वादों व रंगों में अन्तर हो सकता है।

सलाद के रूप में अथवा अलग से सब्जी बनाकर अथवा अन्य सब्जियों में मिलाकर शलजम की जड़े व पत्तियाँ भी खायी जा सकती हैं। कड़वेपन व अनचाहे स्वाद से बचना हो तो छोटे आकार के शलजम लायें एवं उनमें कोई धब्बा न हो। चलें इस शलजम के उपचारात्मक महत्त्व पर प्रकाश डालें.

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शलजम खाने के फायदे

फ़ोलेट – यह बी-विटामिन्स में गिना जाता है जो कि अस्थि-मज्जा (Bonn Marrow) में लाल व सफ़ेद रक्त-कोशिकाओं के निर्माण में, कार्बोहाइड्रेड्स से ऊर्जा के बनने में एवं डीएनऐ व आरएनऐ के निर्माण में सहायता करता है। गर्भावस्था, शैशवावस्था एवं किशोरावस्था जैसी तीव्र बढ़त की अवस्थाओं में पर्याप्त फ़ोलेट अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। Shaljam में फ़ोलेट पर्याप्त परिमाण में सहज उपलब्ध हो जाता है।

अस्थि-स्वास्थ्य – कैल्शियम की प्रचुरता से शलजम अस्थि-छिद्रण (आस्टियोपोरोसिस) के उपचार में उपयोगी है। कैल्शियम हृदय, पेशियों व तन्त्रिकाओं के स्वास्थ्य के भी लिये आवश्यक है।

मैग्निश्यम – यह खनिज Human Body में लगभग 300 विकर-अभिक्रियाओं (एन्ज़ाइम-रियेकशन्स) में भूमिका निभाता है। पेषियों व तन्त्रिकाओं के कार्यों को सुचारु रखने के अतिरिक्त यह रक्तचाप को सामान्य करने एवं प्रतिरक्षा-तन्त्र (Immunity) को ठीक रखने में भी उपयोगी है। मैग्निश्यम शलजम में प्रचुर मात्रा में मिलता है।

फ़ास्फ़ोरस – अस्थियों को स्वस्थ रखने, ऊर्जा-उत्पादन व पेषियों की गति में यह महत्त्वपूर्ण खनिज फ़ास्फ़ोरस Shaljam में सहज मिल जाता है।

पोटेशियम – तन्त्रिकाओं सहित पेशियों व हृदय के स्वास्थ्य के लिये आवश्यक पोटेशियम उच्चरक्तचाप, स्ट्रोक, किड्नी-स्टोन्स, भंगुर अस्थियाँ (आसानी से टूट जाने वाली हड्डियाँ) एवं उच्च रक्त-शर्करा को दूर रखने में सहायक है जो शलजम के सेवन से प्राप्त कर सकते हैं।

विटामिन-सी – शलजम में विटामिन-सी की एवं इसकी पत्तियों में Vitamin – A की भी पर्याप्त मात्रा होती है। विटामिन-सी कोलेजन के निर्माण व शरीर में लौह के अवशोषण में सहायता करता है तथा विटामिन-ऐ दृष्टि के स्वास्थ्य में एवं रतौंधी दूर रखने में महत्त्वपूर्ण है।

कैन्सर से बचाव – शलजम में ग्लुकोसिनोलेट्स होते हैं जो कि पादप-आधारित ऐसे रसायन हैं जो ब्रेस्ट से लेकर प्रोस्टेट तक समस्त प्रकारों के कैन्सर से बचाव में सहायक हो सकते हैं।

नेत्र-स्वास्थ्य – शलजम में ल्युटीन नामक एक एण्टिआक्सिडेण्ट होता है जो मेंक्युलर डिजनरेशन एवं केटेरेक्ट्स जैसी कई नेत्र-समस्याओं को दूर रखने में सहायक है।

शलजम खाने से जुडी सावधानियाँ

*. मल में रक्त जैसी स्थितियों में जाँच कराने से पहले शलजम व गोभी जैसी कुछ सब्जियों का सेवन दो-दिन तक न करें, अन्यथा जाँच में भ्रामक परिणाम (रोग उपस्थिति अनुपस्थिति लग सकती है अथवा अनुपस्थिति उपस्थिति) दिख सकते हैं।

*. रक्तस्कन्दन (ख़ून का जमाव) तेजी से होता हो तो शलजम से सावधान रहना होगा क्योंकि इसमें विटामिन-के अधिक होता है जिससे रक्त सामान्य से अधिक तेजी से जमता है। अतः ऐसी कोई रक्त-विकृति हो तो Doctor से पूछें। अन्यथा शरीर के भीतर नसों में थक्के जम गये तो बड़ी समस्याएँ हो सकती हैं, विषेष रूप से हृद्वाहिकागत (कार्डियोवेस्क्युलर) रोग विकसित हो सकते हैं।

*. वृक्कों द्वारा अतिरेक पोटेशियम को शरीर से निकाल दिया जाता है। वृक्क यदि ठीक से कार्य न कर रहे हों तो शरीर में पोटेशियम की मात्रा बनी रह सकती है जिससे तेज धड़कन एवं पेषियों में दुर्बलता, ऐंठन अथवा कड़ाई जैसी समस्याएँ आ सकती हैं। इसलिये यदि ऐसी कोई समस्या हो तो एक्सपर्ट से मिलें एवं शलजम का सेवन कम मात्रा व आवृत्ति में करें।

शलजम की खेती – शलजम ब्रेसिकेसिएइ कुल की फसल है जो ठण्डे इलाकों में उगायी जाती रही है, वैसे इसे भारत में शीतोष्ण, उष्णकटिबन्ध व उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में भी उगाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, बिहार, हिमाचल प्रदेश एवं तमिलनाडु भारत के प्रमुख शलजम-उत्पादक राज्य हैं। आजकल शलजम के बीज स्थानीय कृषि-दुकानों पर उपलब्ध हैं जिन्हें घर पर लाकर गमलों तक में उगाया जा सकता है।

हरे, बैंगनी, लाल, सफेद इत्यादि रंगों के शलजम मिलते हैं। कुछ लगभग गोलीय तो कुछ अण्डाभ जैसे हो सकते हैं तथा किसी में गोलाई युक्त सतह पर अनेक स्थानों से पत्तियाँ उगती दिख सकती हैं।

खेती विभिन्न प्रकार के शलजमों की की जाती है, जैसे कि पंजाब सफेद, पूसा स्वाति, पूसा चंद्रिमा, पूसा कँचन, पूसा स्वर्णिमा इत्यादि। आजकल गोभीप्रजातियों से शलजम का संकरण (हायब्रिडाइज़ेशन) कराकर तैयार फसलें भी उगायी जा रही हैं। भारत में शलजम को प्रायः रबी मौसम में उगाया जाता है, नवम्बर से अप्रैल के मध्य ठण्डे मौसम में।

शलजम खाने की सेवन-विधि

*. शलजम यदि बड़े आकार के ले आये हों तो उन्हें छील सकते हैं।

*. कच्चे अथवा उबालकर अथवा आलू के साथ पकाकर इनका सेवन किया जा सकता है जिससे स्वाद आयेगा एवं विटामिन्स व खनिजों की कुल मात्रा भी बढ़ जायेगी।

*. शलजम सहित इसकी पत्तियों को भी सीधे कच्चे रूप से खाया जा सकता है, यदि स्वाद अजीब लगे तो अचार अथवा मुरब्बा लगाकर स्वादिष्ट कलेवर प्रदान किया जा सकता है। वैसे अपने आप में शलजम का अचार (shaljam ka achar) भी डाला जा सकता है अथवा गाजर आदि के साथ मिश्रित अचार तैयार किया जा सकता है।

*. गाजर एवं शक्करकन्द के साथ शलजम को भूना जा सकता है ताकि नैसर्गिक मीठापन बढ़ जाये।

*. गोभियों व पत्तेदार सब्जियों के भी साथ शलजम की सब्जी (Shaljam Ki sabji) पकायी जा सकती है।

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