ग्रीष्म ऋतु के लक्षण व लाभ Summer Season Symptom Benefits In Hindi

ग्रीष्म ऋतु के लक्षण व लाभ Summer Season Symptom Benefits In Hindi

Summer Season Symptom Benefits In Hindi

ग्रीष्म ऋतु को सामान्यत ग़र्मी के मौसम के नाम से जानते हैं जब तेज धूप एवं तपन की प्रधानता रहती है। यह छह ऋतुओं में से क्रम में दूसरे स्थान की ऋतु है। ग्रीष्म ऋतु वसन्त ऋतु के बाद व वर्षा ऋतु से पहले आती है।

किस ऋतु में कौन-से मास ? वसन्त में चैत्र व वैशाख, ग्रीष्म में ज्येष्ठ व आषाढ़, वर्षा में श्रावण व भाद्रपद, शरद में अश्विन व कार्तिक, हेमन्त में मार्गशीर्ष व पौष एवं शिशिर में माघ व फाल्गुन मास सम्मिलित हैं।

Summer Season Symptom Benefits In Hindi

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Summer Season

ग्रीष्म ऋतु के लक्षण

1. हेमन्त-शिशिर ऋतुओं में जो धूप तन-मन को प्रसन्न कर देने वाली लगा करती थी वही धूप ग्रीष्मकाल में सूर्य द्वारा आये काल रूप जाल सदृष लगने लगती है। सूर्य की किरणों में इतनी प्रखरता होती है कि प्रात: कालीन धूप भी चुभने जैसी लगने लगती है।

2. ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े व रात्रि छोटी होती है।

3. चरक संहिता में शिशिर ऋतु को उत्तम बलवाली, वसन्त ऋतु को मध्यम बलवाली एवं ग्रीष्म ऋतु को दौर्बल्यवाली कहा गया है। यह हम सभी स्पष्ट रूप से अनुभव कर सकते हैं क्योंकि ग्रीष्मकाल में प्रकृति काल के विकराल गाल में समाती-सी प्रतीत होती है एवं हमें भी शीघ्र थकान अनुभव होने लगती है एवं आलस्य की आशंका बढ़ जाती है, आलस्य से हमें बचकर रहना चाहिए।

4. शरीर से निकलता पसीना शरीर में जल की मात्रा को घटाता रहता है जिससे अन्य ऋतुओं की अपेक्षा अधिक प्यास लगती है तथा सेवन किये जाने वाले जल की मात्रा बढ़ानी पड़ती है, अन्यथा निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) की आशंका रहती है।

5. सूर्य पृथ्वी के निकट आ पहुँचता है तथा वह भूमध्य रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ रहा होता है जिससे सम्पूर्ण भारत वर्ष में तापक्रम बढ़ता है। चूँकि इस समय सूर्य ककरेखा की ओर चल रहा होता है इसलिये इसके साथ तापमान का अधिकतम बिन्दु भी क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता जाता है।

6. उत्तरी भारत में अधिकतम तापमान व न्यूनतम वायु दाब के क्षेत्र में परिवर्तन आने लगता है। पश्चिमोत्तरी भारत के भारतीय महामरुस्थल ‘थार मरुस्थल’ का न्यूनतम वायुदाब क्षेत्र बढ़कर सम्पूर्ण छोटा नागपुर पठार को भी आवृत कर लेता है जिससे स्थानीय व सागरीय आर्द्र हवाएँ इस ओर परिसंचरित होनी आरम्भ हो जाती हैं तथा स्थानीय प्रबल तूफानों का उद्भव होने लगता है। स्थलीय गर्म पेट के विभिन्न अंगों से जुड़ी बीमारियाँ व शुष्क पवन से सागरीय आर्द्र वायु के मिलने से होने वाली मूसलाधार वर्षा व ओलों के गिरने से यहाँ तीव्रगति वाले विनाशक तूफान बन सकते हैं।

7. गुजरात व राजस्थान जैसे अर्द्ध मरुस्थलीय व मरुस्थलीय क्षेत्रों में गर्म हवाएँ चलती हैं जिन्हें ‘लू चलना’ कहा जाता है। सघन वन वाले क्षेत्रों में लू-प्रकोप नहीं दिखता।

8. पश्चिमोत्तर के रेतीले मरुस्थल एवं शुष्क भागों में इस समय गर्म व शुष्क हवाओं के कारण राजस्थान, पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश में प्राय: सायंकाल को धूलभरी आँधियाँ आती हैं जिनके कारण दृष्यता घटती है। धूल के स्वरूप व रंग के आधार पर इन्हें काली अथवा पीली आँधियाँ कह दिया जाता है। सामुद्रिक प्रभाव रहने से दक्षिण भारत में न तो ये गर्म हवाएँ चलती हैं, न ही आँधियाँ चलती हैं।

9. ग्रीष्म में वर्षा – ग्रीष्मकाल में मानसून के आगमन से पहले पश्चीमी तटीय मैदानी भागों में भी कुछ वर्षा होती है जिसे ‘मैंगो शावर’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त असम व पश्चिम बंगाल में भी तीव्र व आर्द्र हवाएँ चलने लगती हैं जिनसे गरज के साथ वर्षा हो जाती है जिसे असम में ‘चाय वर्षा’ कहते हैं। इन हवाओं को ‘काल वैशाखी’ अथवा ‘नारवेस्टर’ के नामों से जाना जाता है। यह वर्षा पूर्व-मानसून वर्षा कहलाती है।

ग्रीष्मकाल के लाभ

1. ग्रीष्म ऋतु में जितनी तीव्र गर्मी पड़ती है वर्षा ऋतु में उतनी प्रचुर वर्षा होने की सम्भावना जतायी जाती है।

2. ग्रीष्म में कई अनाजादि पकते हैं एवं बहुसंख्य बीज तैयार होते हैं तथा पेड़-पौधे प्रकाश – संष्लेषण तेजी से कर पाते हैं जिससे उनकी बढ़त अन्य ऋतुओं से तुलना में तेज होती है तथा पुष्पन-फलन भी भरपूर होता है जबकि लोग यह धारणा बनाये बैठे रहते हैं कि ग़र्मी में पौधों का विकास ठीक से नहीं हो पा रहा, अतः इन्हें अपनी इस भ्रान्त धारणा को तत्काल बदल लेने की आवश्यकता है।

3. कई प्रकार के रोगप्रद सूक्ष्मजीव-कीट-पतंगे घट जाते हैं।

4. पसीना खू़ब आने से रक्त व त्वचा की आन्तरिक सफाई अच्छे से हो पाती है परन्तु जीन्स व अन्य सिंथेटिक कपड़ों से हर मौसम में दूरी बरतें.

5. आम्र, लीची इत्यादि रसीले फलों की आमद होती है जो सूखते कण्ठ को अमृतरस के समान प्रतीत होते हैं।

6. मानव-पशु सब प्रजातिवाद भूलकर बस छाँव व ठण्डक की आस में एक हो जाते हैं। कवि बिहारी ने कहा था – ” कहलाने एकत वसत, अहि मयूर मृग-बाघ। जगत तपोवन सों कियो, दीरघ दाघ निदाघ।। अर्थात् ग्रीष्म की दुपहरी गरमी से व्याकुल पशु परस्पर बैरभाव छोड़कर निर्विरोध हो जाते हैं। उन्हें साथ बैठे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह जगत् एक तपोवन है जहाँ रहने वाले प्राणियों में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं होती।

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