गर्भहनन के लक्षण कारण और उपचार Miscarriage in Hindi

मिस्कैरेज के लक्षण कारण और उपचार Miscarriage Symptoms Causes Treatment in Hindi

Miscarriage Symptoms Causes Treatment in Hindi

गर्भहनन क्या होता है ?

गर्भावस्था में 20 सप्ताह से पहले (साधारणतया पहली तिमाही के दौरान) गर्भस्थ शिशु के मरण को गर्भहनन (Miscarriage) कहा जाता है। वास्तव में गर्भहनन गर्भपात (एबोर्शन) से अलग है क्योंकि गर्भपात में गर्भस्थ शिशु की मृत्यु जान-बूझकर करायी जाती है। इस प्रकार गर्भहनन में बच्चा गिरता है जबकि गर्भपात में बच्चा गिराया जाता है।

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गर्भहनन के लक्षण

1. हल्के से भारी रक्तस्राव अथवा स्पाटिंग.. इसमें हल्का योनि-रक्तस्राव होता है जो सामान्य मासिक स्राव से अलग होता है, स्पाटिंग में साधारणतः कुछ परिमाण में रक्त होता है।
2. गम्भीर ऐंठनें
3. पेट के निचले हिस्से में कष्ट अथवा कमरदर्द
4. कमज़ोरी
5. ज्वर
6. भार घटना
7. श्वेत-गुलाबी श्लेष्मा (म्यूकस)
8. संकुचन
9. योनि से ऐसे ऊतक निकलना जो रक्त-स्कन्दों (ख़ून के थक्कों) जैसे लग रहे हों
10. गर्भावस्था के लक्षण कम हो जाना

गर्भहनन के कारण व जोख़िम कारक

गर्भहनन के अधिकांश मामले अजन्मे शिशु में प्राणघातक आनुवंशिक समस्याओं से हुए होते हैं जिनका सम्बन्ध प्रायः माता से नहीं होता। समग्रता में निम्नांकित समस्याएँ गर्भहनन की आशंका को बलवती बना सकती हैं..

1. संक्रमण (इसमें ठण्ड व बुखार सम्भव)
2. खाद्य-विषाक्तता
3. गर्भवती को मधुमेह अथवा Thyride सम्बन्धी अनियमितता होना अथवा अन्य हार्मोनल समस्याएँ अथवा अन्य कोई चिकित्सात्मक स्थिति
4. प्रतिरक्षा-तन्त्र की क्रियाएँ
5. गर्भवती में कोई शारीरिक समस्या
6. धूम्रपान
7. मद्यपान
8. ड्रग्स-सेवन
9. Doctor की देखरेख के बिना सेवन की गयी औषधियाँ
10. विकिरण अथवा विषाक्त पदार्थों से सम्पर्क

11. गुणसूत्रीय असामान्यताएँ – अनेक प्रकार की गुणसूत्रीय असामान्यताएँ सम्भव, जैसे कि इण्ट्रायूटेराइन फ़ेटल डेमिस में भ्रूण निर्मित तो होता है परन्तु गर्भावस्था के लक्षण अनुभव होने से पहले ही नष्ट हो जाता है, सम्भव है कि ऐसे गर्भहनन के लक्षण भी न अनुभव हों। मोलर गर्भावस्था में गुणसूत्रों के दोनों समुच्चय (Sets) पिता से आते हैं एवं भ्रौणिक परिवर्द्धन नहीं होता। आंशिक मोलर गर्भावस्था में माता के गुणसूत्र तो होते हैं परन्तु पिता के दो समुच्चयों के गुणसूत्र भी आ जाते हैं।

भ्रूण में कोशिका-विभाजन ठीक से न हो पाने अथवा क्षतिग्रस्त अण्डाणु अथवा शुक्राणु के कारण भी गर्भहनन हो सकता है। प्लेसेण्टा से जुड़ी समस्याओं से भी गर्भहनन हो सकता है। गर्भहनन का जोख़िम बढ़ जाता है यदि इनमें से कोई कारक साथ हो.. गर्भवती की आयु 35 वर्ष से अधिक हो अथवा तीन अथवा अधिक गर्भहनन हो चुके हों तो।

12. गर्भाशय में असामान्यताएँ – जैसे कि गर्भाशय की ग्रीवा (बच्चेदानी का मुँह) शिशु को थाम पाने लायक मजबूत न हो तो सर्विकल इन्सफ़िशियन्सी हो जाती है जिसमें प्रायः दूसरी तिमाही में बच्चा गिर जाता है। अचानक दबाव अनुभव होने लगना एवं बच्चे व गर्भवती का सम्पर्क टूटने जैसे लक्षण हो सकते हैं तथा हो सकता है कि फिर दर्द पहले से कम हो जाये।

ऐसे प्रकरण में आगामी गर्भधारण के लिये चिकित्सिका द्वारा लगभग 12वें सप्ताह में ‘सक्र्लिंग’ टाँके का प्रयोग किया जा सकता है ताकि बच्चेदानी के मुख को प्रसव के समय तक बाँधकर रखा जा सके। यदि पहले कभी गर्भहनन न भी हुआ हो परन्तु चिकित्सिका को सर्विकल इन्सफ़िषियन्सी की आषंका हो रही हो तो भी उसके द्वारा यह परामर्श दिया जा सकता है।

गर्भहनन के प्रकार

थ्रीटेण्ड गर्भहनन – रक्तस्राव हो रहा हो एवं गर्भहनन का ख़तरा लग रहा हो परन्तु बच्चेदानी का मुख चौड़ा नहीं हुआ हो। सम्भावना है कि बिना किसी समस्या के गर्भावस्था जारी रहेगी।

अवश्यंभावी गर्भहनन – रक्तस्राव हो रहा हो एवं ऐंठनें पड़ रहीं हों। बच्चेदानी का मुख चैड़ा हो गया हो। गर्भहनन की आशंका है।

अपूर्ण गर्भहनन – शिशु अथवा प्लेसेण्टा से कुछ ऊतक शरीर से बाहर आ गया हो परन्तु कुछ भाग गर्भाशय के भीतर अब भी हो।

पूर्ण गर्भहनन – सम्पूर्ण गर्भावस्था-ऊतक शरीर से निकल आये हों। इस प्रकार का गर्भपात प्रायः गर्भावस्था के 12वें सप्ताह से पहले होता है।

मिस्ड गर्भहनन – भ्रूण मृत हो गया हो अथवा कभी बना ही न हो परन्तु ऊतक गर्भाशय में हों।

आवर्ती गर्भहनन (रिकरेण्ट मिस्कैरेज- आरएम) – तीन अथवा अधिक गर्भावस्थाओं में प्रथम तिमाही के दौरान लगातार शिशु मृत्यु हुई हो।

गर्भहनन की जाँच

श्रोणिक परीक्षण (पेल्विक एग्ज़ाम) – गर्भाशयी ग्रीवा – बच्चेदानी का मुँह फैलना शुरु हुआ कि नहीं।

अल्ट्रासाउण्ड – गर्भस्थ शिशु के हृद्स्पन्दनों को सुनने के लिये ध्वनि-तरंगों का प्रयोग। परिणाम यदि स्पष्ट न हों तो एक सप्ताह में अन्य जाँच सुझायी जा सकती है।

रक्त-परीक्षण – गर्भवती के रक्त में गर्भावस्था से जुड़े हार्मोन्स को परखा जाता है एवं पूर्व के स्तरों से उनकी तुलना की जाती है। एनीमिया की भी जाँच की जा सकती है यदि रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो।

ऊतक-परीक्षण – यदि ऊतक शरीर से निकला हो तो उसे प्रयोगषाला भिजवाकर यह पुष्टि की जा सकती है कि गर्भहनन हुआ था अथवा नहीं। इससे यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि लक्षणों का और कौन-सा कारण हो सकता है।

गुणसूत्रीय परीक्षण – यदि दो अथवा अधिक गर्भहनन हो चुके हों तो यह परखने के लिये पति-पत्नी की गुणसूत्रीय जाँच की जा सकती है कि इनदोनों में से कहीं किसी के किसी अनुवंशक (जीन) के कारण तो गर्भहनन नहीं हो रहा।

गर्भहनन का उपचार

गर्भहनन होने का तात्पर्य सदैव यह नहीं होता कि उर्वरता (फ़र्टिलिटी) समस्या है ही। तीन अथवा अधिक बार गर्भहनन के प्रकरणों में कुछ अनुसंधाताओं का ऐसा आकलन है कि यह Autoimmune Response के कारण हो सकता है।

यदि गर्भहनन सम्पन्न हो चुका हो एवं गर्भाशय खाली हो तो सम्भवतया किसी उपचार की जरूरत नहीं है। कभी-कभी समस्त ऊतक बाहर नहीं आते तो चिकित्सिका द्वारा डायलेशन एण्ड क्यूरेट्टेज (D and C) प्रोसिजर की जा सकती है जिसमें वह गर्भाशय की ग्रीवा को विस्फारित (डायलेट) करती है व शेष ऊतकों को निकालती है।

उपचार उपरान्त रक्तस्राव बन्द होने पर सामान्य दिनचर्यात्मक गतिविधियाँ फिर से शुरु की जा सकती हैं। यदि बच्चेदानी का मुँह अपने आप डायलेट हो गया हो परन्तु अब भी गर्भावस्था हो तो हो सकता है कि यह स्थिति इन्काम्पिटेण्ट सर्विक्स वाली हो जिसमें चिकित्सिका द्वारा सक्र्लेज नामक एक प्रोसिजर अपनाते हुए उसे बन्द किया जा सकता है।

यदि स्त्री का रक्तप्रकार आरएच Negative है तो उसे आरएच इम्यून ग्लोब्युलिन (र्होगम) नामक एक रक्त-उत्पाद का सेवन कराया जा सकता है ताकि भविष्य में गर्भधारण करने पर वे प्रतिरक्षी (एण्टिबाडीज़) न बन पायें जो गर्भस्थ शिशु अथवा बाद की गर्भावस्थाओं को हानि पहुँचा सकते हों।

यदि दो से अधिक गर्भहनन लगातार हो चुके हों (आवर्ती गर्भहनन) तो रक्त-परीक्षण, आनुवंशिक जाँचें इत्यादि करायी जा सकती हैं। इस स्थिति में निम्नांकित जाँचें भी करायी जा सकती हैं..

*. पेल्विक अल्ट्रासाउण्ड
*. हिस्टेरोसाल्पिंगोग्रेम – गर्भाशय व डिम्बवाहिनियों (फ़ेलोपियन ट्यूब्स) का एक एक्स-रे
*. हिस्टेरोस्कापी – चिकित्सिका दूरदर्शी जैसा एक पतला उपकरण योनि के माध्यम से भीतर प्रवेश करा सकती है ताकि गर्भाशयी ग्रीवा से लेकर गर्भाशय के भीतर देखा जा सके।

गर्भहनन से बचाव

*. शारीरिक सक्रियता को नैसर्गिक रूप से बनाये रखें.. साईकल चलायें, रस्सी कूदें।

*. आरोग्यप्रद स्थानीय ताजा व संतुलित आहार सेवन करें।

*. संक्रमणों से यथासम्भव बचकर चलें, फिर भी यदि कोई आशंका हो तो चिकित्सक से मिलें।

*. धूम्रपान, मद्यपान व ड्रग्स से दूरी बरतें। चाय-काफ़ी का सेवन अधिक न करें।

गर्भधारण में सावधानी

पति-पत्नी साथ जाकर स्त्रीरोग चिकित्सिका से चर्चा करें। कुछ Expert का ऐसा मानना है कि एक मासिक चक्र से लेकर 3 माह की अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही अगले गर्भधारण का प्रयास करें।

पुनः गर्भहनन होने की आशंका को कम करने के लिये प्रोजेस्टॅरोन से उपचार का सुझाव दिया जा सकता है जो कि ऐसा हार्मोन है जो भ्रूण गर्भाशय में रोपित होने में एवं आरम्भिक गर्भावस्था में सहायक होता है। गर्भहनन के बाद शारीरिक व मानसिक दोनों रूपों में ठीक होना महत्त्वपूर्ण है।

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