पुरुषों को होने वाले रोग व उपचार Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi

पुरुषों को होने वाले रोग व उपचार Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi

Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi

जिस प्रकार स्त्रीरोग होते हैं उसी प्रकार पुरुष रोग भी होते हैं जो पुरुषों को ही हो सकते हैं किन्तु सामाजिक विडम्बना यह है कि स्त्रीरोगों की बात तो होती है परन्तु पुरुष रोगों का उल्लेख नाममात्र के लिये भी कभी-कभी ही दिख पाता है।

हम कुछ पुरुष रोगों का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं एवं समस्याओें के कारणों, बचाव व निवारण का भी आवश्यकतानुसार उल्लेख कर रहे हैं। जब भी ऐसा कोई रोग हो तो पुंरोगविज्ञानी (Andrologist), मूत्रोजनन रोग-शल्यचिकित्सक (Euro-Genital Surgeon), मूत्ररोग विशेषज्ञ (Urologist) से मिलें.

Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi

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Mens Health Problems

1. प्रोस्ट्रेट कैन्सर –

प्रोस्ट्रेट पुरुषों में ही पाया जाने वाला अंग है जिसमें अतिरिक्त ऊतक-निर्माण हो जाने से इसका कैन्सर हो जाता है। प्रोस्ट्रेट मूत्राशय के नीचे व मलाशय के सामने एक ग्रंथि होती है। अधिक आयु में प्रोस्ट्रेट कैन्सर की आशंका अधिक रहती है। बिना कैन्सर के भी कई प्रोस्ट्रेट समस्याएँ सम्भव हैं, जैसे कि इस ग्रंथि के आकार में वृद्धि अथवा सूजन।

विभिन्न प्रोस्ट्रेट-समस्याओं में लक्षणों के रूप में मूत्रोत्सर्ग के दौरान मूत्र बूँदों में निकलना, मूत्रोत्सर्ग के समय दर्द अथवा जलन, बारम्बार मूत्रोत्सर्ग, मूत्र में रक्त, कमर के पिछले निचले भाग में अथवा नितम्बों में अथवा कमर के नीचे आगे-पीछे कहीं बारम्बार दर्द अथवा कड़ाई अथवा मूत्र निकल न पाना सम्भव।

2. शिष्नमुण्ड-शोथ (बेलेनाइटिस) –

यदि शिष्नमुण्डाच्छद (शिष्नमुण्ड पर चढ़ी त्वचा) में भी सूजन हो तो उसे शिष्नमुण्डाच्छद-शोथ (बेलेनोपोस्थिटिस) कहा जाता है। दर्द, सूजन, खुजली, चकत्ते, शिष्न से तेज गंध वाले डिस्चार्ज जैसे लक्षण सम्भव।

निज शारीरिक स्वच्छता का ध्यान रखें, शिष्न की खाल को खींचे बिना साफ-सफाई बरतें ताकि जीवाणु, पसीना, मृत कोशिकाओं का जमाव न हो। फ़ाइमोसिस युक्त पुरुषों में इस समस्या की आशंका अधिक होती है क्योंकि उनमें शिष्न की त्वचा अटकी हुई-सी होती है जिससे सूजन की सम्भावना बनी रहती है।

शिष्नमुण्ड-शोथ के अन्य कारणों में चर्मशोथ (डर्मेटाइटिस) व संक्रमण सम्मिलित हैं, विशेषतया यीस्ट अथवा अन्य यौन-संक्रामकों से। संक्रमण की स्थिति में चिकित्सक प्रतिजैविक (विशेषतः कवक-रोधी) लिखता है। अन्तिम उपचार के रूप में शिष्नमुण्डाच्छद को छोटी-सी शल्यक्रिया से निकाल दिया जाता है।

पेराफ़ाइमोसिस में मूत्रोत्सर्ग में समस्या आ सकती है एवं त्वचा वापस अपने मूल रूप में लौटने में दिक्कत कर सकती है। शिष्न में रंग बदलने अथवा घिसने-रगड़ने जैसे निशाँ अथवा संकेत सम्भव।

वैसे पेट व आँत रोग विशेषज्ञ अथवा यूरोलाजिस्ट चिकित्सकों द्वारा ऐसे कई मामलों को हाथ व सामान्य उपकरणों से ठीक किया जा सकता है। फ्ऱेन्युलम ब्रेव (शार्ट फ्ऱेन्युलम) नामक एक अन्य स्थिति में शिष्नमुण्डाच्छद को शिष्नमुण्ड से जोड़ने वाला त्वचा-भाग सामान्य से छोटा होता है, इससे भी शिष्न उत्तेजना अथवा मूत्रोत्सर्ग में कष्ट हो सकता है।

3. शैष्निक कैन्सर –

पैनाइल कैन्सर शिष्न की त्वचा की कोशिकाओं से आरम्भ होता है। समय रहते उपचार न कराया तो शिष्न के कुछ भाग अथवा पूरे शिष्न को शल्यक्रिया से निकालने की आवश्यकता पड़ सकती है।

शैष्निक कैन्सर के लक्षणों में त्वचा का मोटा होना अथवा रंग बदलना, शिष्न पर चकत्ते अथवा छोटे पपड़ीदार ददोड़े, नीले-भूरे-से उभार, शिष्न में कुछ माँसल बढ़त, शिष्न की खाल से दुर्गन्धयुक्त डिस्चार्ज, शिष्न पर घाव अथवा रक्तस्राव, शिष्नमुख में सूजन, कमर के नीचे अथवा मूलाधार के क्षेत्र में माँस के ढेले बनना सम्भव।

कारणों में ह्यूमन पेपिलोमा वायरस, आयु 60 वर्ष से अधिक होना, धूम्रपान, HIV अथवा एैड्स अथवा किसी यौन संक्रमण अथवा अन्य स्थिति के कारण प्रतिरक्षा-तन्त्र दुर्बल पड़ना सम्मिलित, ध्यान रखें कि निरोध आदि कोई भी उपाय एक-दूसरे के शारीरिक तरल पदार्थों को एक-दूसरे से जाने में सफलतापूर्वक नहीं रोक सकता।

4. शिष्न का टेढ़ापन –

शिष्न दायें-बायें अथवा ऊपरी-नीचे थोड़ा-सा झुका अथवा मुड़ा हो तो सामान्य बात है परन्तु यदि यह टेढ़ापन इतना अधिक हो कि पत्नी से यौनसम्बन्ध में बाधा बने अथवा पति को कोई शारीरिक समस्या हो तो उपचार कराया जा सकता है।

टेढ़ापन प्रायः पेरोनी-रोग के कारण होता है जिसमें शिष्न में कैल्सिफ़िकेशन अथवा प्लेक (क्षतिग्रस्त ऊतक) का निर्माण हो चुका होता है। प्लेक-निर्माण में व्यक्ति को उत्तेजना में दर्द अनुभव हो सकता है परन्तु दर्द अधिक होने पर उपचार किया जा सकता है।

5. शैष्निक फ्ऱेक्चर –

शिष्न में हड्डी नहीं होती फिर भी एक स्थिति को पैनाइल फ्ऱेक्चर कहते हैं जिसके दौरान चटखने अथवा थप्पड़ मारने जैसी आवाज़ आ सकती है, उत्तेजना एकदम से घट सकती है, चोट के बाद तेज दर्द सम्भव, चोटिल क्षेत्र के बाहर रगड़न जैसा गहरा निशान, शिष्न मुड़ना, शिष्न से रक्तस्राव, मूत्रोत्सर्ग में पीड़ा इत्यादि सम्भव। शैष्निक फ्ऱेक्चर के अनेक कारण हो सकते हैं.

जैसे कि यौन सम्बन्ध के दौरान गुदा अथवा योनि में झटके से शिष्न-प्रवेश अथवा जरबन शिष्न प्रवेश, छिद्र में शिष्न-प्रवेश के दौरान पति अथवा पत्नी का आसन एकदम बदल जाने से, स्तनों अथवा जाँघों में शिष्न को रगड़ने से अथवा दीवार अथवा किसी ठोस जगह पर शिष्न टकराने से (उत्तेजित अथवा सामान्य रूप में), कार-दुर्घटना, हस्तमैथुन इत्यादि से.

मुखमैथुन के समय पत्नी के सिर पर थपकी मारने से अथवा उसका निचला जबड़ा दब जाने से एवं गुदामैथुन सहित हस्तमैथुन के दौरान शिष्न-फ्ऱेक्चर की आशंका अधिक रहती है।

सार्वजनिक स्थान में उभार अदृष्य करने के लिये उत्तेजित शिष्न को दबाकर पैण्ट में भीतर कहीं हाथ से घसीटने अथवा शिष्नवृद्धि के प्रयास के नाम पर शिष्न को मलने अथवा शिष्न को खींचने, मरोड़ने अथवा दबाने से भी यह सम्भव। उपचारार्थ चिकित्सक के पास जायें, शल्यक्रिया भी आवश्यक हो सकती है।

6. अविरत शिष्नोत्थान (प्रियापिज़्म) –

इसमें शिष्न में उत्तेजना बनी रहती है एवं कठोरता से दर्द व लालिमा सम्भव। बिना बात के उत्तेजना चिकित्सात्मक रूप से असहज स्थितियों को ला सकती है। तथाकथित शक्तिवर्द्धक दवाओं से भी यह अवांछनीय स्थिति आ सकती है। मेरु-रज्जु (स्पाइल कार्ड) अथवा रक्त से सम्बन्धित कुछ समस्याओं से भी ऐसा सम्भव है। स्थायी क्षति से बचाने के लिये शल्यक्रिया भी करायी जा सकती है।

7. वेरिकोसील्स –

पैरों में वेरिकोसील षिराओं के समान ही वृषणकोष (स्क्रोटम) में भी वेरिकोसील हो सकता है जिसमें वृषणकोष में फूली हुई वेरिकोज़ शिराओं के कारण सूजन बनी रह सकती है, वैसे इसके लक्षण अनुभव न होने भी सम्भव हैं।

8. हायड्रोसिल – इसमें वृषणों के आसपास तरल का जमाव हो जाता है।

9. वृषणकोष का कैन्सर – उपचार में वृषणकोष में से किसी वृषण को निकालना आवश्यक हो सकता है। रेडियेषन व कीमोथिरेपी सम्भव। इस कैन्सर के लक्षणों में वृषणकोष में खिंचाव, पेट के निचले भाग में हल्की खुजली, पुरुष-स्तनों में आकार वृद्धि अथवा नरमी एवं कमरदर्द सम्भव।

10. वृषण-मरोड़न – टेस्टिक्युलर तर्षण में स्पर्मेटिक कार्ड मुड़ जाती है जिससे वृषण की ओर रक्त-आपूर्ति ठीक से नहीं हो पाती। वृषण में तेज दर्द इसका लक्षण होता है। एक वृषण दूसरे वृषण से ऊँचा लग सकता है व उल्टी भी सम्भव।

11. वृषणरहितता – क्रिप्टार्किडिज़्म में वृषणकोष में एक अथवा दोनों वृषणों का अभाव होता है।

12. वृषण-शोथ – आर्काइटिस में किसी एक अथवा दोनों वृषणों में सूजन, दर्द व संक्रमण सम्भव। अधिवृषणशोथ (एपिडिडिमाइटिस) के समान अधिवृषण (एपिडिडिमिस) में सूजन की सम्भावना अधिक रहती है।

13. अधिवृषण-शोथ – एपिडिडिमाइटिस में एपिडिडिमिस में सूजन आ जाती है, वृषण के पिछले भाग में मुड़ने जैसा निशान दिख सकता है। उस वृषण को उठाने से दर्द में राहत लग सकती है।

अन्य लक्षणों में सूजन, मूत्रोत्सर्ग के समय जलन अथवा बारम्बार मूत्रोत्सर्ग सम्मिलित हो सकते हैं। गोनोरिया अथवा क्लेमाइडिया से ग्रसित व्यक्ति से लैंगिक सम्बन्ध से यह हो सकता है। गुदा में शिष्न प्रवेश करने अथवा करवाने वालों में भी इसकी आशंका अधिक होती है जिनमें एण्टरिक बैक्टीरिया प्रसारित हो सकता है जिससे यह सूजन आयी हो।

14. नपुंसकता – पत्नी की योनि में शिष्न-प्रवेश करने योग्य कठोरता पति के शिष्न में न आ पाने को नपुंसकता कहा जाता है। वैसे लघुलिंगी (माइक्रोपेनिस) की स्थिति में भी ऐसा सम्भव है जिसमें शिष्न पूर्ण उत्तेजना में डेढ़-दो इन्च से कम रहता है।

15. पुरुष-वंध्यत्व – जब भी बाँझपन की बात आती है केवल स्त्रियों की ओर देखा जाता है जबकि 50 प्रतिशत मामलों में वास्तव में बाँझपन पुरुषों में पाया गया है जिसमें पति के वीर्य अथवा उसमें शुक्राणुओं की गुणवत्ता उतनी नहीं होती कि पत्नी को गर्भधारण करा सके।

बचाव – व्यक्ति यदि हस्तमैथुन, गुदामैथुन, मुखमैथुन, परस्त्री/परपुरुषसम्बन्ध, समलैंगिकता, माँसाहार, जीन्स पैण्ट, धूम्रपान व मद्यपान सहित पोर्न इत्यादि से दूर रहेगा तो नपुंसकता, शिष्न का टेढ़ापन व फ्ऱेक्चर इत्यादि बहुत सारे पुरुषरोगों के ये मुख्य कारण उत्पन्न ही नहीं हो पायेंगे

मार्गदर्शन – अन्य स्थितियों व मार्गदर्शन के लिये मार्गदर्शक व लेखक सुमित कुमार से (9425605432) पर सीधे सम्पर्क किया जा सकता है।

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तो ये थी हमारी पोस्ट पुरुषों को होने वाले रोग व उपचार, Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi,Purusho ko hone wale rog. आशा करते हैं की आपको पोस्ट पसंद आई होगी और Mens Sexual Disease Problems Solution In Hindi की पूरी जानकारी आपको मिल गयी होगी. Thanks For Giving Your Valuable Time.

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