कमर दर्द के कारण व उपचार Lower Back Pain Causes Treatment In Hindi

कमर दर्द के कारण व उपचार Lower Back Pain Causes Treatment In Hindi

Lower Back Pain Causes Treatment In Hindi

विशेष रूप से घर में उठापटक के कार्य अधिक करने से गृहिणियों को व कार्यालय में बैठे-बैठे कार्य करने के कारण पुरुषों को कमर दर्द से जूझना ही पड़ता है परन्तु इस दर्द के कारण कई हैं तथा उपचार के प्रयासों से पहले कारण की पहचान महत्त्वपूर्ण है ताकि दुःखती कमरिया में उमरिया न बीत जाये.

Lower Back Pain Causes Treatment In Hindi

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Lower Back Pain

कमर दर्द के कारण –

*. स्प्रैन – दो हड्डियों को परस्पर जोड़ते ऊतकों के बैण्ड्स में चोट.

*. स्ट्रैन – हड्डी से पेशी को जोड़ने वाले ऊतक के बैण्ड व पेशी में चोट.

*. मेरु-रज्जु (स्पाइनल कार्ड) का कैन्सर.

*. सायटिका – इसमें कमर व पैरों में दर्द व सूजन आती है.

*. आथ्र्राइटिस.

*. वृक्क-संक्रमण.

*. मेरु में संक्रमण.

*. बढ़ती उम्र – मेरु व कशेरुकाओं ( vertebrae) के मध्य तरल-अंश आयु बढ़ने के सापेक्ष घटता जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरु में Discuss आसानी से घिसने लगेंगी। पेशियों में उतना बल नहीं रह जायेगा जिससे चोट की आशंका बढ़ जाती है। पीठ की डिस्क्स में आसानी से चोट लग जाती है। ऐसी चोटें किशोरावस्था के बाद और आसानी से लगने लगती हैं।

*. रप्चर्ड व हॅर्नियेटेड डिस्क – डिस्क का बाहरी भाग टूटने व हॅर्नियेट होने की आशंका बनी रहती है। इस स्थिति को स्लिप्ड व रप्चर्ड डिस्क भी कहा जाता है जब मेरु-रज्जु व नर्व रूट्स पर डिस्क के पास की उपास्थि सरकने लगती है। मेरु-कशेरुकाओं के मध्य लगा गद्दा अपनी सामान्य स्थिति से बाहर आने लगता है।

इसके परिणामस्वरूप नर्व-रूट का कम्प्रेषन होता है क्योंकि यह मेरु-रज्जु से निकलती है व कशेरुका-अस्थियों से होकर गुजरती है। यह स्थिति आड़े-तिरछे बैठने, झटके से उठने-बैठने व शरीर का भार एक पाश्र्व (साइड) पर छोड़कर चलने से आ सकती है।

*. गर्भाशय की गाँठें-

वैसे कमरदर्द के कारणों का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है, जैसे कि जन्मजात् (कंकाली अनियमितताएँ, स्पाइना बायफ़िडा), चोटें, डिजनरेटिव समस्याएँ (संधियों में सूजन से जुड़ी विकृतियाँ), तन्त्रिका व मेरु-रज्जुसम्बन्धी समस्याएँ (सायटिका, स्पाण्डिलोलिस्थेसिस, स्पाइनल स्टेनासिस, काडा इक्विना सिण्ड्राम), रीढ़-असम्बन्धी कारक (एण्डोमॅट्रियोसिस, वृक्काष्मरी, फ़ायब्रोमायल्जिया)

कमर दर्द की जाँचें –

मल-मूत्र वेग पर्याप्त समय तक न रोक पाने, कमज़ोरी, बुखार, पैरों में सुन्नता व उनमें जान न रहने जैसा लगना, नितम्बों में संवेदन कम होना व झुनझुनी इत्यादि जैसे लक्षण दिखते रहें व समस्या समाप्त न हो रही हो व बार-बार आ रही हो व अन्य गम्भीरताएँ उत्पन्न होने की आशंका हो तो एक्स-रेज़, सीटी स्कॅन, अल्ट्रासाउण्ड व एमआरआईज़ कराते हुए अस्थि-समस्याओं, डिस्क-समस्याओं, लिगामेण्ट्स व कण्डराओं (टेण्डन्स) से जुड़ी समस्याओं को परखा जा सकता है।

अस्थियों में सामथ्र्य में कमी लगने पर चिकित्सक द्वारा बोन स्कॅन व बोन डेन्सिटी टेस्ट करवाया जा सकता है। तन्त्रिकाओं से जुड़ी समस्या तो नहीं यह देखने के लिये इलेक्ट्रोमायोग्रॅफ़ी व नर्व कण्डक्षन कराया जा सकता है। रुधिर में कैल्सियम, फ़ास्फ़ेट व विटामिन-डी की मात्राओं की भी जाँच करायी जा सकती है।

कमर दर्द का उपचार –

1. कमर दर्द व पैरों के दर्द में सोते समय दोनों जाँघों के केवल निचले भाग (घुटनेसहित) के मध्य दोनों पैरों के बीच तकिया रखकर सो सकते हैं.

2. मर्दन (मालिश) – अस्थियों के कष्ट से राहत देने व पेशियों में रक्तसंचार बढ़ाने में सहायक.

3. बेक व स्पाइनल मॅनिप्युलेशन.

4. शल्यक्रिया – मल-मूत्रवेग कुछ समय भी रोके न जा सकें व तन्त्रिकीय क्षति बढ़ती ही जा रही हो तो ऐसे गम्भीर प्रकरणों में शल्यक्रिया आवश्यक हो सकती है। विकृति के अनुसार ये शल्यक्रियाएँ कई प्रकार की हो सकती हैं.

जैसे कि स्पाइनल लॅमिनेक्टामी अर्थात् स्पाइनल डिकम्प्रेषन में स्पाइनल कॅनाल को बड़ी करने के लिये लॅमिना का हटा दिया जाता है जिससे मेरु-रज्जु व तन्त्रिकाओं पर दबाव से राहत होती है।

शल्यक्रिया के बारे में निर्णय करना वृद्धावस्था इत्यादि ऐसी दषाओं में बहुत कठिन हो सकता है जब शरीर की मरम्मत-प्रक्रिया धीमी पड़ चुकी हो व नवीन कोशिकाओं व ऊतकों का पुनर्निर्माण पर्याप्त रूप से न हो पाने की आशंका हो।

कमर दर्द से बचाव –

*. धूम्रपान त्यागें तथा किसी भी प्रकार के तम्बाकू-उत्पादों से अन्य स्वास्थ्य-समस्याएँ तो होती ही हैं, साथ ही में डिस्क्स में रुधिर व आक्सीजन का प्रवाह धीमा पड़ सकता है जिससे ये तेजी से डिजनरेट होने लगती हैं।

*. नैसर्गिक रूप से शारीरिक सक्रियता बढ़ायें, यदि तोंद व मोटापा है तब जो यह बहुत आवश्यक है ही किन्तु भार सामान्य व कम होने की स्थिति में भी हाथ-पैरों को प्राकृतिक रूप से चलाना अति आवश्यक है ताकि शरीर के अंगों-प्रत्यंगों में रुधिर-परिसंचरण सुचारु रहे।

*. रीढ़ झुकाने के बजाय घुटने मोड़कर सामग्रियों को उठायें व रखें.

*. उठते-बैठते-खड़े होते समय आसन-मुद्रा का ध्यान रखें, आड़े-तिरछे न रहें.

*. शवासन में (पीठ के बल हाथ-पैर सीधे रखकर व फिर पूरा शरीर ढीला छोड़ते हुए समतल व कम नर्म सतह पर) सोयें

*. कुर्सी के चयन में अपनी ऊँचाई का ध्यान रखें तथा कम्प्यूटर व वाहन (साईकल, बाइक, कार आदि) में भी सीट इत्यादि में परिवर्तन करायें ताकि आपकी रीढ़ से लेकर सिर तक यथासम्भव एकसीध में रहें.

*. हीलवाले जूते-चप्पल न पहनें |

*. रुधिर में कैल्सियम की कमी हो तो दूध, अनाज का सेवन बढ़ायें।

*. फ़ास्फ़ोरस कम हो तो दुग्धोत्पाद, सूर्यमुखी व कद्दू के बीजों व फलियों का सेवन अधिक किया करें।

*. विटामिन-डी की मात्रा बढ़ानी हो तो दुग्ध, सोयाबीन व धूपसेवन करें।

*. सूर्य-नमस्कार इत्यादि ऐसे आसनों व मुद्राओं वाले सहज योग करें जिनसे पेशियों व अस्थियों (विशेषतया रीढ़) में लचीलापन आये।

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