दस्त (अतिसार) के लक्षण प्रकार व घरेलु उपचार

दस्त (लूज मोशन) के लक्षण घरेलू उपचार और परहेज Loose Motion Dast Symptoms Treatment in Hindi

Loose Motion Dast Symptoms Treatment in Hindi

अतिसार (दस्त, लूज़ मोशन, डायरिया) क्या होता है

इसमें आँत की गतियों अर्थात मलोत्सर्ग की आवृत्ति अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है एवं मल पतला हो जाता है। दस्त में किसी कारणवश आँत में तरल का स्रावण अधिक हो जाता है, आँत से तरल का अवशोषण कम हो जाता है अथवा आँत के माध्यम से मल का जाना तेज हो जाता है।

दस्त क्या नहीं है

दस्त से निम्नांकित स्थितियों को अलग समझना आवश्यक है (चाहे ये स्थितियाँ दस्त के साथ आयी हों किन्तु निम्नांकित चारों के कारण व उपचार भी भिन्न-भिन्न होंगे)

  • मलोत्सर्ग असंयम : इसमें व्यक्ति मलोत्सर्जन के लिये थोड़ा भी धैर्य नहीं रख पाता।
  • रेक्टल अर्जेन्सी : इसमें उत्सर्जन के लिये आँत इतनी असहज हो जाती है कि तुरंत शौचालय जाना पड़ता है।
  • भोजनोपरान्त तुरंत मलवेग लगने लगना।
  • पेट पूरा खाली न होना : इसमें मलोत्सर्ग के बाद जल्दी ही ऐसी अनुभूति होने लगती है कि फिर से शौचालय जाने की आवश्यकता है तथा दूसरी बार में मलोत्सर्ग सरलता से नहीं होता।

दस्त के लक्षण

  • पेटदर्द विशेष रूप से ऐंठन
  • मल में पतलापन अथवा आकृतिविहीन मल
  • बारम्बार मलोत्सर्ग की आवश्यकता अनुभव होना
  • उल्टी
  • जी मिचलाना
  • दस्त के साथ अथवा सामान्य मल के साथ आँव

अन्य लक्षण दस्त के कारण पर निर्भर होंगे, जैसे कि छोटी आँत व बड़ी आँत के जीवाण्विक संक्रमण बैक्टीरियल एंटेरोकोलाइटिस के विपरीत वायरल गेस्ट्रोएंटॅराइटिस में प्राय: मल में रक्त अथवा मवाद नहीं आता तथा यदि बुखार हुआ तो कुछ बुखार रह सकता है।

अमीबा नामक एक प्रोटोज़ोआ के कारण हुए अमीबियासिस अर्थात अमीबिक डिसेण्ट्री में लक्षण दिख सकते हैं व नहीं भी तथा इसमें भी दस्त एक लक्षण के रूप में हो सकता है, अन्य लक्षणों में पेटदर्द अथवा ख़ूनी दस्त सम्मिलित हो सकते हैं।

Loose Motion Dast Symptoms Treatment in Hindi

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दस्त के प्रकार

दस्त के प्रकार – प्रकाराधार पर कारण व उपचारों में भी भिन्नता हो सकती है.

*. तात्कालिक दस्त – इसमें दस्त कभी-कभी होते हैं अथवा दो-तीन दिन में स्वतः ठीक हो जाते हैं, ये विषाण्विक, जीवाण्विक हो सकते हैं व परजीवियों के कारण भी हो सकते हैं। जीवाणुओं से भी तात्कालिक अथवा तेज खाद्य-विषाक्तता हो सकती है। कोई नयी दवाई शुरु करने से भी समस्या सम्भव, जैसे कि कीमोथिरेपी मेडिसिन्स, प्रतिजैविक, अनियमित हृद्स्पन्दों को एवं उच्चरक्तचाप को नियन्त्रित करने की औषधियाँ लेने से.

*. दीर्घकालिक दस्त – इसमें आये दिन दस्त की समस्या बनी रहती है अथवा दस्त कई दिनों तक होते हैं अथवा बिना उपचार के स्थिति नियन्त्रण में आती नहीं लगती, दीर्घकालिक दस्त कई गम्भीर रोगों का संकेत हो सकता है, जैसे कि इर्रिटेबल बावेल सिण्ड्राम, सेलिएक डिसीस, अल्सरेटिव कोलाइटिस, पित्त अम्ल का अवशोषण ठीक से न हो पाने एवं डम्पिंग सिण्ड्राम का.

*. आपेक्षिक दस्त – इसमें दैनिक रूप से मलोत्सर्ग की संख्या अधिक होती है अथवा सामान्य औसत व्यक्ति से तुलना में मल में पतलापन आ जाता है।

*. पूर्ण दस्त – इसमें चैबीस घण्टों में पाँच से अधिक बार मलोत्सर्ग हेतु जाना पड़ता है अथवा पतले दस्त होते हैं।

दस्त का परीक्षण

तात्कालिक दस्त हेतु :

*. मलपरीक्षण – श्वेत रक्त-कोशिकाओं अथवा ऐसे विकरों (एन्ज़ाइम्स) के लिये मल-परीक्षण कराये जा सकते हैं जिनकी अतिरिक्त उत्पत्ति हुई हो अथवा मल में परजीवियों आदि की पहचान करने के लिये ऐसे परीक्षण सम्भव, जीवाणुओं के लिये संवर्द्धन (कल्चर) द्वारा परीक्षण
*. वैद्युत्-अपघट्यों से सम्बन्धित असामान्यताओं के लिये रक्तपरीक्षण

दीर्घकालिक दस्त हेतु :

*. मल-परीक्षण परजीवियों को परखने के लिये एवं वसा को मापने के लिये.
*. अपर गेस्ट्रोइन्टेस्टाइनल एक्स-रेज़ (यूजीआई सिरीज़).
*. बैरियम एनिमा.
*. इसोफ़ेगो-गेस्ट्रो-डुओडिनोस्कोपी (ईजीडी) के साथ बायोप्सी.
*. कोलोनोस्कोपी के साथ बायोप्सी.
*. छोटी आँत की एण्डोस्कोपी के साथ बायोप्सी.
*. हायड्रोजन ब्रेथ टेस्टिंग.
*. अग्न्याषयी कार्य-परीक्षण.

दस्तसम्बन्धी जटिलताएँ –

*. निर्जलीकरण (डिहायड्रेशन) – शरीर में पानी की कमी
*. वैद्युत् – अपघट्य (खनिज) असामान्यताएँ
*. गुदा में असहजता – खुजली व जलन आदि

दस्त का उपचार

*. निर्जलीकरण को दूर करने के लिये इलेक्ट्रोल अथवा ‘ओरल रिहायड्रेषन साल्यूषन’ (ओआरएस) का सेवन किया जा सकता है तथा नारियल-पानी, नींबू-शिकंजी, जल-जीरा, बेल का शर्बत, लस्सी, चावल का माँड़, खट्टे फल इत्यादि घरेलु उपाय अपनायें, प्यास न लगने पर भी थोड़े-थोड़े समय में पानी पीयें.

*. जिन लोगों को हर बार चटनी अथवा तले-भुने खाने, चाय-काफ़ी से दस्त की शिकायत रही हो वे इनका सेवन कम कर सकते हैं.

*. माँसाहार व मद्यपान (शुगर-एल्कोहाल से भी) से दूर रहें.

*. कृत्रिम शर्करा से दूरी बरतें.

*. सफाई व अधिक हाथ धोने पर ज़ोर दें, विशेष रूप से विषाण्विक (वायरल) दस्त के प्रकरण में, दूषित स्थानों में रखे कटे फल-सब्जी न खायें.

*. पेक्टिन का सेवन बढ़ायें जो कि नींबूवर्गीय फलों व सेब में पाया जाता है, हो सके तो नींबू के एक छोटे-से टुकड़े का सेवन दिन में दो-चार बार छिल्का सहित करें (पानी से साबुत निगल लें) क्योंकि इसके छिल्के में पेक्टिन अधिक मात्रा में पाया जाता है.

*. हरे व कच्चे केले की सब्जी खायें.

*. दहीं व अन्य किण्वित दुग्धोत्पाद जिनमें प्रोबायोटिक्स होते हैं.

दस्त में प्रतिजैविकों के प्रयोग से बचने की सलाह दी जाती है परन्तु यदि कल्चर में जीवाण्विक संक्रमण की पुष्टि हुई हो तो चिकित्सक के लिखित प्रिस्क्रिप्षन से प्रतिजैविक का सेवन किया जाये।

यदि कभी कोई प्रतिजैविक लिया हो तो चिकित्सक को अवश्य बतायें। दीर्घकालिक दस्त संक्रामक हो सकता है अथवा अन्य किसी छुपे रोग का संकेत हो सकता है, इसलिये घरेलु उपचारों के भरोसे न बैठे रहें, पेट व आँत रोग विशेषज्ञ से मिलें।

इष्चॅरिचिया कोलइ के कुछ स्ट्रैन्स मानव के पाचन-तन्त्र के लिये हानिप्रद होते हैं, अतः इन जीवाणुओं से बचने के लिये यदि पानी संदिग्ध लगे तो उसे उबालकर पीयें, अन्यथा मूत्रपथ-संक्रमण की आषंका हो सकती है जिसके बाद मूत्राशय अथवा वृक्क-संक्रमण सम्भव तथा ये जीवाणु रुधिर-धारा में चले आने से सेप्सिस भी हो सकता है।

स्थिति गम्भीर लगे अथवा 48 घण्टों में भी सुधरती न दिखे अथवा तेज बुखार अथवा ठण्ड अनुभव हो अथवा मल के साथ रक्त निकले अथवा मल का रंग काला, गहरा अथवा बैंगनी लगे अथवा पेट के किसी हिस्से में तेज दर्द हो रहा हो अथवा गर्भवती को दस्त हो अथवा मल में बारम्बार कच्चा आहार निकल रहा हो तो चिकित्सक, हो सके तो पेट व आँत रोग विशेष से सीधे सम्पर्क करें.

बच्चे को दस्त होने पर बालरोगविशेषज्ञ से मिलें। मन से दवाइयों का सेवन न तो स्वयं करें, न करायें, बिस्मथ यौगिकों (जैसे कि पेप्टो-बिस्माल) कई लोगों को एलर्जिक हो सकता है.

चिकनपाक्स, इन्फ़्लुएन्ज़ा व अन्य विषाण्विक संक्रमणों से ग्रसित बच्चों व किशोरों में इसके सेवन से रेऐ’ज़ सिण्ड्राम पनप सकता है जो कि प्राथमिक रूप से यकृत व मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला एक रुग्णत्व है। चिकित्सक को भी ध्यान रखना चाहिए कि पेप्टो-बिस्माल दो वर्ष से छोटे बच्चों को बिल्कुल न दे।

बच्चों में निर्जलीकरण को पहचानने में विशेष सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं, जैसे कि तीन घण्टे अथवा अधिक अवधि में उसने मूत्रोत्सर्ग न किया हो, मुख अथवा जिह्वा में सूखापन, देहताप अधिक लगना, बिना अश्रुओं के रोना, उनींदापन, प्रतिक्रिया न करे अथवा चिड़चिड़ा रहा हो अथवा पेट, नेत्रों अथवा गालों में धँसाव लग रहा हो।

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