मासिक धर्म पीरियडस स्थितियाँ व उपचार

मासिक धर्म पीरियडस स्थितियाँ व उपचार How to Solve Periods Problem Upchar In Hindi

मासिक स्राव ऐसा विषय है जिसके ‘सामान्य’ होने के पैमाने अलग-अलग औरतों के सन्दर्भ में शारीरिक व हार्मोनल स्थितियों के अनुरूप अलग-अलग हो सकते हैं। पीरियड्स आने व रक्तस्राव कम-अधिक होने इत्यादि में असामान्यता अनुभव होने के कई कारण व प्रभाव सम्भव हैं.

दो पीरियड्स में 21 दिन से कम अवधि अथवा 35 दिन से अधिक अवधि हो अथवा आंशिक बदलाव के बजाय कोई असामान्यता लगे तो स्त्रीरोग चिकित्सिका से मिलें, वैसे तो उपलब्ध चिकित्सात्मक जाँचों व स्त्रीरोग चिकित्सिका द्वारा ही निदान व उपचार सटीकता से सम्भव हैं परन्तु फिर भी पाठकों के समझने के लिये यहाँ मासिक स्राव सम्बन्धी कुछ स्थितियों का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है.

How to Solve Periods Problem Upchar In Hindi

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Periods Problem

प्रिमेंस्ट्रुअल सिण्ड्रोम – यह सिण्ड्रोम पीरियड आरम्भ होने के एक-दो सप्ताह पहले आता है। इस सिण्ड्रोम में हल्की ऐंठन, थकान, पेट फूलना, चिड़चिड़ापन, पीठ दर्द, स्तन कष्ट, एक्ने, तेज भूख, अवसाद, तनाव, अनिद्रा, कब्ज़, दस्त सम्भव किन्तु प्रायः पीरियड आरम्भ होने पर लक्षण मिट जाते हैं। हर महीने अलग लक्षण व गम्भीरता में बदलाव भी सम्भव।

मेनोरेजिया (हेवी पीरियड्स) – इसमें सामान्य से अधिक रक्तस्राव होता है, पीरियड की अवधि 5-7 दिन से अधिक भी हो सकती है। प्रायः हार्मोनल असंतुलन से ऐसा होता पाया गया है।

भारी अथवा असामान्य मासिक स्राव के अन्य कारणों में ये सम्मिलित हैं. किशोरावस्था का आरम्भ, योनि-संक्रमण, बच्चेदानी के मुख में सूजन, हाइपोथायराइडिज़्म (थाइरायड ग्रंथि की कम सक्रियता), नान-कैन्सरस गर्भाशयी ट्यूमर(फ़ायब्राइड)।

एमेनोरिया (पीरियड्स न होना) – 16 वर्ष से कम आयु में पहला पीरियड नहीं शुरु होने को प्राथमिक एमेनोरिया कहा जाता है। पीयूष ग्रंथि-सम्बन्धी किसी जन्मजात विकार से ऐसा हो सकता है। द्वितीयक एमेनोरिया तब कहा जाता है जब 6 महीनों अथवा अधिक अवधि तक नियमित पीरियड्स नहीं आते।

किशोरावस्था में दोनों प्रकार के एमेनोरिया के कई कारण हो सकते हैं – एनोरेक्ज़िया, हाइपरथायराइडिज़्म (अतिसक्रिय थाइरायड ग्रंथि), अण्डाशयी सिस्ट्स, आकस्मिक भारवृद्धि अथवा कमी, गर्भधारण।

वयस्कावस्था में एमेनोरिया के ये कारण हो सकते हैं – प्रिमेचर ओवेरियन फ़ैल्योर, पेल्विक इन्फ़्लेमेटरी डिसीस (एक प्रजनन-संक्रमण), गर्भावस्था, बच्चे को स्तनपान, रजोनिवृत्ति। मासिक स्राव रुकने का एक कारण गर्भधारण भी हो सकता है।

पीड़ापूर्ण पीरियड्स – ये फ़ाइब्रियाइड्स, पेल्विक इन्फ़्लेमेटरी डिसीस, एण्डोमेट्रियोसिस (गर्भाशय के बाहर असामान्य ऊतक-वृद्धि) से हो सकते हैं।

हाइपोमेनोरिया (लाइट पीरियड) – अधिकांशतया पीरियड्स में 30-50 मिलीलीटर्स रक्त निकलता है किन्तु हाइपोमेनोरिया में प्रति चक्र 30 मिलीमीटर्स से भी कम। इस स्थिति को हाइपोमेनोरिया कहा जाता है। इसे अच्छा मानने से पहले ध्यान रहे कि कम रक्तस्राव होना भी समस्याप्रद हो सकता है। हाइपोमेनोरिया के कई कारण हो सकते हैं, जैसे –

गर्भावस्था का संकेत – गर्भावस्था में पीरियड रुक जाता है अथवा कुछ स्त्रियों में हल्का पीरियड रह सकता है। असामान्य रूप से हल्के पीरियड्स अथवा स्पाटिंग से यह भी संकेतित हो सकता है कि एक्टोपिक गर्भावस्था हो अर्थात् गर्भाशय को छोड़कर अन्यत्र भ्रूण पल रहा हो। यह स्थिति बहुत ख़तरनाक हो सकती है।

भार में बहुत कमी या बढ़ोत्तरी – दैहिक वजन में तेज उतार-चढ़ाव से पीरियड्स हल्के अथवा छोटे हो सकते हैं। भारवृद्धि में शरीर में अधिक वसा हो जाता है जिससे हार्मोन-स्तरों में बदलाव सम्भव।

कैलोरी – सेवन घटाने से हुई भार-कमी से शरीर पर आन्तरिक तनाव पड़ सकता है अथवा हार्मोनल असंतुलन आ सकता है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, विटॅमिन्स व वसा की संतुलित मात्राओं वाले आहार सेवन करते हुए अतिभार व अल्पभार दोनों स्थितियों से बचा जा सकता है।

तनाव – शारीरिक व मानसिक तनाव, अतिरेक शारीरिक-मानसिक परिश्रम से आये शारीरिक हार्मोन-स्तर-परिवर्तनों से भी लाइट ब्लीडिंग सम्भव।

थायराइड अतिसक्रियता – हाइपरथाइरायडिज़्म में अत्यधिक थाइराइड हाॅर्मोन्स के कारण हृदय, रक्तचाप, पेषियों इत्यादि में गम्भीर स्थितियाँ पनपने से भी लाइट पीरियड्स की समस्या आ सकती है। यदि हाइपरथाइराडिज़्म के अन्य लक्षण अनुभव होते हों तो भी अपनी जाँचें करा ही लें।

पालिसिस्टिक ओवरी सिण्ड्राम – इसमें अण्डाषयों में असामान्य रूप से अधिक एण्ड्रोजन्स बनने लगते हैं। ऐसी स्थिति में अण्डाषयों में छोटे-छोटे तरल-पूरित कोष अथवा सिस्ट्स बन सकते हैं।

सम्भव है कि इन हार्मोनल परिवर्तनों के कारण स्त्रियों में सामान्य अण्डोत्सर्ग न हो पाये जिनके साथ आये लक्षणों में एक्ने अथवा तैलीय त्वचा, भारवृद्धि अथवा शरीर पर अतिरेक बाल सम्भव, जैसे कि पीरियड होने पर औसत से भारी या हल्के पीरियड लग सकते हैं। अन्य लक्षणों में अनियमित अथवा मिस्ड पीरियड्स सम्मिलित हैं।

रजोनिवृत्ति की पूर्वसूचना – रजोनिवृत्ति की उम्र आने पर भी पीरियड्स में हल्कापन अनुभव हो सकता है।

सर्विकल स्टेनोसिस – यह समस्या वैसे कम ही होती है जिसमें बच्चेदानी का मुख- सर्विक्स संकुचित हो जाता है अथवा पूर्णतया बन्द हो जाता है।

प्रसव में काफी रक्तहानि – कभी प्रसव के दौरान बहुत रक्त निकल जाने से शरीर में आक्सीजन की कमी सम्भव है। इससे पीयूष ग्रंथि प्रभावित होने से लगभग समस्त प्रकार के हार्मोन्स निकलने कम हो सकते हैं।

मासिक स्राव सम्बन्धी असामान्यताओं का निदान – सर्वप्रथम एक आदत बनायें कि अपने मासिक चक्र का लेखा-जोखा स्वयं रखें ताकि कुछ परिवर्तन होने पर स्वयं को समझ आ जाये। असामान्यता अथवा असहजता अथवा कोई संदिग्ध बदलाव दिखने पर सीधे स्त्रीरोगचिकित्सिका से मिलें।

स्त्रीरोग चिकित्सिका शारीरिक परीक्षण करते हुए पेल्विक एग्ज़ाम कर सकती हैं जिसमें आन्तरिक जननांगों को भीतर से परखते हुए योनि अथवा बच्चेदानी के मुँह में सूजन को जाँचा जाता है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित जाँचें आवश्यक हो सकती हैं..

पेप स्मियर टेस्ट – कैन्सर अथवा ऐसी अन्य स्थितियों का पता लगाने के लिये।

मूत्र व रक्तपरीक्षण – हार्मोनल स्तरों में असामान्य बदलावों को परखने के लिये।

एण्डोमेट्रियल बायोप्सी – गर्भाशयी आस्तर का सैम्पल लेकर प्रयोगशालेय विश्लेषण।

हिस्टेरोस्कोपी – एक छोटा-सा कैमरा गर्भाशय में प्रवेश कराकर असामान्यमाताओं को देखने का प्रयास।

अल्ट्रासाउण्ड – गर्भाशय के पिक्चर्स तैयार करने के लिये।

पीरियड के दौरान उपचार

सम्बन्धित कारणों तक पहुँचने के बाद ही स्त्रीरोग चिकित्सिका उपचार की ओर बढ़ सकती है, अनुमान के आधार पर कुछ भी करना जोख़िम पूर्ण हो सकता है। पेल्विक इन्फ़्लेमेटरी डिसीस के मामले में प्रतिजैविक लिखे जा सकते हैं। अन्य स्थितियों में हार्मोनल औषधियाँ अथवा आवश्यकतानुसार शल्यक्रियाएँ सम्भव। बचाव व सावधानियों में निम्नलिखित को अपनाया जा सकता है..

1. शारीरिक सक्रियता नैसर्गिक रूप से बढ़ायें – स्त्रियों को ऐसा लगता है कि घर के काम ही इतने हो जाते हैं कि अलग से कुछ करने की ज़रूरत नहीं परन्तु वास्तव में साईकल चलाना, रस्सी कूदना व सीढ़ियाँ चढ़ने, तेज चाल में चलने जैसी शारीरिक गतिविधियाँ महत्त्वपूर्ण हैं।

2. पोषक आहार का सेवन करें – यह वह नहीं खाना पूर्वाग्रह छोड़कर हर फल-सब्जी खायें, हर बार थाली में अधिकाधिक विविधता का ध्यान रखें, जैसे कि भाजियाँ-तरकारियाँ, अलग-अलग नैसर्गिक स्वाद व रंग के खाद्य-पदार्थ हर बार थाली में रखने का प्रयास करें क्योंकि शरीर में कुछ पोषकों के अवशोषण के लिये अन्य पोषकों की उपस्थिति आवश्यक होती है।

3. खान-पान में अदरख, अनन्नास व दालचीनी की मात्रा बढ़ायें।

4. संतरा, साबुत अनाज, दूध व धूप द्वारा अपने शरीर में विटामिन-डी का संष्लेषण बढ़ायें।

5. विटामिन बी6 की मात्रा बढ़ाने के लिये चना, केला, पालक, तरबूज का सेवन पहले से अधिक करें।

6. माँस, मद्य व धूम्रपान पूर्णतया रोकें (हमेशा के लिये)।

7. शुगरी सोडा ड्रिंक्स, नमकीन, कैफ़ीन, फ़ास्ट फ़ूड्स से स्थितियाँ बिगड़ सकती हैं।

8. अनावश्यक चिंताओं व तनावों से दूर रहेंः योग-आसन इत्यादि में रुचि लैवें।

9. निजी शारीरिक स्वच्छता का ध्यान रखें।

10. पीरियड के दौरान अथवा दो पीरियड्स के बीच तेज दर्द, असामान्य रूप से भारी रक्तस्राव (कपड़ा बारम्बार अत्यधिक गीला हो जाता हो अथवा घण्टों तक गीला रहता हो अथवा ख़ून के बड़े थक्के निकल रहे हों).

असामान्य अथवा अतिदुर्गंधयुक्त योनि-डिस्चार्ज, तेज बुखार, सात दिन से अधिक अवधि तक पीरियड चलने, रजोनिवृत्ति के दौरान योनि में रक्तस्राव अथवा दो पीरियड्स के बीच अथवा बाद में स्पाटिंग, नियमित मासिक चक्र रहने के बाद पीरियड्स अत्यधिक अनियमित हो गये हों, पीरियड के दौरान मितली अथवा उल्टी, बेहोशी व सिर चकराने जैसी स्थितियों में तुरंत स्त्रीरोग चिकित्सिका से मिलें।

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