संक्रामक बीमारियों से कैसे बचें ! Infectious diseases In Hindi

संक्रामक बीमारियों से कैसे बचें How To Protect Infectious diseases In Hindi

How To Protect Infectious diseases In Hindi

हमारे आसपास ऐसी कई बीमारियाँ है जिनका न ही हमें ज्ञात होता है और न ही हमें उसका पता लगता है. वह जब हो जाती है तब हमें अहसास होता है की इस प्रकार की बीमारी ने हमें घेर लिया है.

दोस्तों, आज कोरोना का खौफ पूरे विश्व में है लेकिन केवल कोरोना ही नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त भी ऐसी ढेरों बीमारियाँ हैं जो बड़ी आसानी से फैलती रहती हैं, हमें जागरुकता की आवश्यकता है ताकि इन सभी से यथासम्भव बचाव हो सके।

How To Protect Infectious diseases In Hindi

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संक्रामक संसर्गज/संचरणीय रोग क्यों कहे जाते हैं ?

क्योंकि ये जीवाणुओं, विषाणुओं, कवकों, प्रोटोज़ोआ अथवा अन्य परजीवियों के माध्यम से होते हैं जो एक से अन्य में फैल सकते हैं। यहाँ पर फैलने के माध्यम के आधार पर संक्रामक रोगों का विवरण पेश किया जा रहा है ताकि हम सरलता से उनसे बच सकें :

दूषित खाद्य-पेय के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

कोलेरा, डिसेण्ट्री, शिगेला नामक एक जीवाणु से होने वाला शिगेलोसिस, हेलिकोबैटर पायलोरी से आमाशय का कैन्सर और पेप्टिक अल्सर सम्भव।

इष्चॅरिया कोलाई – यह संक्रमित पेय व खाद्यों एवं नदी-तालाब में नहाने से फैलता है, यह एवं साल्मोनेला, लिस्टीरिया, कॅम्पीलोबॅक्टर जैसे कई सूक्ष्मजीव ग़ैर-पाश्च्युरीकृत दूध से भी फैल सकते हैं, केवल उबालने से सब नहीं मिट सकते।

और वैसे भी गाय-भैंस को यदि टी.बी. अथवा अन्य कोई संक्रामक रोग हुआ तो वह सरलता से दूध के माध्यम से मनुष्यों को हो सकता है क्योंकि समुचित पाश्च्युराइज़ेशन कारखानों में ही सम्भव है।

बासे खाने अथवा जूठन खाने से भी उपरोक्त रोग हो सकते हैं क्योंकि खाना पकाने के कुछ घण्टों में ही उसमें सुपाच्य आहार ग्रहण करने के लिये विभिन्न सूक्ष्मजीव पनप जाते हैं तथा जूठन में व्यक्ति की लार व त्वचा-सम्पर्क इत्यादि का समावेश हो सकता है (जैसे कि स्ट्रा अथवा गिलास से पानी पीते समय), खुले में शौच बन्द करने की आवश्यकता है एवं मलवाहिनियों (सीवेज-लाइन्स) को नैसर्गिक जलस्रोतों में मिलने से रोकना अतीव आवश्यक है।

माँसाहार (अण्ड इत्यादि) से फैलने वाले संक्रामक रोग :

टाक्सोप्लाज़्मोसिस, आँत में ट्रिचिनोसिस इत्यादि।

लैंगिक सम्पर्क के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

गोनोरिया : समय रहते इस जीवाणिक संक्रमण का पता लग गया तो उपचार सम्भव, गुप्तांगों से तरल अपने आप निकलना इसका लक्षण है, मूत्रोत्सर्ग के समय जलन अथवा कठिनता भी सम्भव। इससे संक्रमित आधी स्त्रियों में लक्षण नहीं पाये गये। वैसे यह पुरुषों में भी होता है।

सिफ़लिस : यदि इस जीवाण्विक संक्रमण का इलाज न कराया तो मानसिक बीमारी, पक्षाघात, हृदय को क्षति, अंधत्व व मृत्यु तक के मामले होते देखे गये हैं। इसके लक्षणों में व्रण (अल्सर) अथवा पीड़ारहित व्रण (कांक्रे), थकान, हल्का बुख़ार सम्मिलित हैं।

एचआईवी।

यकृतशोथ (हिपैटाइटिस) ए, बी, सी।

अधिवृषणशोथ : इसमें पेट के निचले भाग में दर्द, वृषणकोष में खिंचाव अथवा मूत्र में रक्त आना सम्भव, यह अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीवों से होता व फैलता पाया गया है।

ह्यूमन पॅपिलोमा वायरस (एचपीवी) : इससे व अन्य सूक्ष्मजीवों से होने वाले जैनाइटल वाट्र्स से गर्भाषय की ग्रीवा एवं शिष्न में कैन्सर तक हो सकता है। यह गुदा इत्यादि गुप्तांगों के अतिरिक्त कभी-कभी मुख में भी हो सकता है।

हर्पीज़ : यह अनेक प्रकार का होता है और यौन सम्बन्धों के अतिरिक्त साथ तैरने से भी हो सकता है (अथवा उस धारा से भी जिसमें नहा रहे चुके संक्रमित व्यक्ति के हर्पीज़ बहकर आ रहे हों), यह मस्तिष्क में दशकों तक प्रसुप्त पड़ा रह सकता है।

क्लेमाइडिया : यह स्त्री-पुरुष गुप्तांगों सहित गले व नेत्र में (नेत्र के प्रकरण बहुत कम) भी हो सकता है। इससे स्त्रियों में बाँझपन का आना सम्भव। ट्राइकोमोनास वैजाइनेलिस नामक एक प्रोटोज़ोअन परजीवी से ट्राइकोमोनियासिस होता है। स्त्री-पुरुषों को गुप्तांगों में जलन अथवा खुजली सम्भव, आधे से अधिक मामलों में इसके लक्षण नहीं समझ आये किन्तु यह फैला अवश्य।

लिम्फ़ोग्रॅन्युलोमा वेरेरियम : यह जीवाणिक संक्रमण गले व गुप्तांगों के आसपास के क्षेत्र से भी फैल सकता है।

प्यूबिक लाइस : यह परजीवी शरीर के बालों, बिस्तर, टावेल, कपड़ों इत्यादि द्वारा भी अनजाने में फैल जाता है।

अन्य यौनसंक्रमण : यौनसंक्रमणों की सूची बहुत लम्बी है जिनमें पेल्विक इन्फ़्लेमेटरी डिसीस सम्मिलित है जो कई सूक्ष्मजीवों से हो सकती है। अण्डवाहिनी व अण्डाशय भी इनके निवास हो सकते हैं।

इनके अतिरिक्त शुक्राशय, मूत्रनली, योनि व स्त्री-पुरुष के अन्य गुप्तांगों के संक्रमण, जैसे कि योनि व मुख का केण्डिडियासिस, अर्थात् कॅण्डिडा नामक एक खमीर (यीस्ट) के रूप में होने वाला एक कवक(फफूँद)-संक्रमण इत्यादि सूची यहाँ दर्शनी असम्भव है।

लैंगिक रूप से संक्रामक रोगों से कैसे बचें ?

निरोध को सुरक्षा का आश्वासन न समझें, वास्तव में निरोध का लचीलापन उसकी छिद्रिल बनावट के कारण होता है, इसके बारीक छिद्र विषाणुओं व अन्य कई दैहिक तरलों से अधिक सूक्ष्म नहीं होते इसलिये निरोध को पार करना इनके लिये सरल रहता है।

अतः लैंगिक सम्बन्ध केवल अपने जीवनसाथी से रखें तथा एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन सम्बन्ध बना चुके व्यक्ति में यौन-संक्रामक रोग होने की आशंका सर्वाधिक होती है क्योंकि चाहे कितनी भी तथाकथित सावधानियाँ बरत लें, त्वचा व दैहिक तरलों के माध्यम से कई कण व द्रव एक-दूसरे में जायेंगे ही जायेंगे।

वैसे यौन सम्बन्धों द्वारा यौनसंक्रमण व अन्य रोग मल, लार, आहार इत्यादि से भी फैल सकते हैं क्योंकि मुख मैथुन, गुदा मैथुन व साँसों के माध्यम से फैलाव की आशंका कई गुनी हो जाती है, जैसे कि हिपैटाइटिस ऐ मल द्वारा फैलने वाला संक्रमण माना जाता है किन्तु चूँकि यह मलसंक्रमित वस्तुओं व मौखिक सम्पर्क से फैल सकता है इसलिये गुदा व मुख के सम्पर्क द्वारा बड़ी सरलता से फैल जाया करता है।

इसी प्रकार यौन सम्बन्ध के दौरान ज्ञात-अज्ञात रूप में रक्त भी निकल सकता है जिससे रक्तजनित संक्रमण फैलते रहते हैं। कई बार स्त्री-पुरुषों को दशकों तक पता ही नहीं चलता कि उन्हें अनेक संक्रमण हो चुके हैं, ऐसे लोग अन्य के लिये बड़े हानिप्रद होते हैं क्योंकि ये स्वयं लक्षण विहीन रोगवाहक बनकर घूम रहे होते हैं। निरोध अथवा कोई भी लोशन अथवा क्रीम न तो किसी रोग संक्रमण हो रोकने का आश्वासन दे सकता है, न ही गर्भधारण को रोकने का।

स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

स्केबीज़ नामक परजीवी और भी बहुत संक्रमण स्पर्ष के माध्यम से फैल सकते हैं, अतः हाथ न मिलायें, न ही गले लगेंगे. अपने हाथों अथवा वस्तुओं से त्वचा-नेत्र इत्यादि को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से छूने, खुरचने, खुजलाने से बचें।

बच्चों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले खिलौने नियमित रूप से धोयें (विशेष रूप से तब जब बच्चा बहुत छोटा होने से लार गिराता हो अथवा बाहर के बच्चों ने उसके खिलौने छुए हों). परिवार के बाहर के लोगों से अपने जूतों व मौजों की अदला-बदली न करें, अपने जूते-मौजे भी समय-समय पर अपने आप धोते रहें।

स्विमिंग पूल, नदी-तालाब में स्नान के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

प्न्यूमोनिया, हिपैटाइटिस इत्यादि रोग सरलता से फैलने से स्विमिंग पूल को संक्रामक रोगों का केन्द्र कहें तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी, चाहें नहाकर स्विमिंग पूल में उतरें फिर भी लार, कान-नाक के तरल उसमें आकर सभी के मुख व शरीर में आ ही जाते हैं तथा कुछ मात्रा में मूत्रोत्सर्ग भी उसमें मिला हो सकता है।

श्वास के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

राजयक्ष्मा (तपेदिक, टी.बी.), कोरोना तथा ऊपरी व निचले श्वसन-पथ के विभिन्न संक्रमण।

रक्त के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोग :

जैसे कि हिपैटाइटिस सी, सावधानीवश इंजेक्शन लगवाने के लिये नयी सिरिन्ज का प्रयोग करवायें (स्वयं के ही लिये नहीं अपने पशु के लिये भी यह सावधानी बरतनी है ), जल्दबाज़ी में कोई लापरवाही न होने दें।

वैसे विभिन्न प्रकार के फ़्लू एवं इन्फ़्लुएन्ज़ा कई माध्यमों द्वारा फैल सकते हैं और तो और ऊपर किये गये वर्गीकरण में भी ऐसे कई संक्रमण हैं जो अन्य माध्यमों से भी फैलते हैं, जैसे कि मस्तिष्क व रीढ़ सम्बन्धी सूजन मेनिन्जाइटिस मुख के स्पर्ष अथवा आमने-सामने मुख आने से तक फैल सकता है। ध्यान रहे कि त्वचा के सम्पर्क से फैलने वाले रोग भी यौनसम्बन्ध से
फैलेंगे ही।

संक्रमण से जुडी भ्रांतियाँ व निवारण :

भ्रांति 1 : वीर्यस्खलन से पहले कोई संक्रमण नहीं हो सकता !

निवारण : वीर्यस्खलन से पहले जो सूक्ष्म तरल निकलता है उसमें भी कई सूक्ष्मजीव होते हैं व शुक्राणु तक हो सकते हैं तथा यदि गुप्तांगों की बात न भी करें तो भी दोनों शरीरों की त्वचाएँ व साँसें तो सम्पर्क में आयेंगी ही अतः संक्रमण से बचा नहीं जा सकता यदि सम्बन्ध बनाये जा रहे हों तो।

भ्रांति 2 : स्त्री से पुरुष में संक्रमण फैलने की आशंका कम रहती है!

निवारण : ऐसा बोलना बेहतर होगा कि संक्रमण की दिशा दोनों ओर रहती है परन्तु स्त्री से पुरुष की अपेक्षा पुरुष से स्त्री की ओर तेजी से फैलाव हो सकता है क्योंकि स्त्री संरचना काफ़ी आन्तरिक होती है परन्तु स्मरण रखें कि शिष्नमुण्ड व शिष्नमुख योनि के प्रत्येक तरल को अपने में सोखकर पुरुष शरीर के भीतर उसके अंशो को पहुँचा देता है, अतः संक्रमण की किसी दिशा को कमतर न आँकें।

भ्रांति 3 : यदि टीका लगा लिया तो संक्रमण नहीं होगा !

निवारण : अधिकांश संक्रामक रोगों के टीके नहीं होते, जिनके होते भी हैं तो भी टीकें लगवा लेने से संक्रमण की आशंका घट सकती है परन्तु समाप्त नहीं हो जाती, अतः आगे भी सतर्कताएँ तो बरतनी ही होंगी।

संक्रामक रोगों से बचने के उपाय तो उपरोक्त कारणों व विवरण में ज्ञात हो ही गये होंगे, फिर भी अन्य सावधानियाँ भी बरतनी चाहिए, जैसे कि वाहन में पीछे बैठते समय ख़्याल रहे कि आगे वाला बोलते समय थूक न गिराये क्योंकि वह आपको लग सकती है, अन्य स्थानों पर भी पास-पास न बैठें, लिफ़्ट लेने (विशेष रूप से अपरिचित से) बचें, मनुष्यों से अनावष्सक मेल-मिलाप न करें.

अन्य कई सावधानियाँ तो कोरोना-जैसी होंगी तथा सामान्य साफ़-सफ़ाई के नियमों का पालन करें, जैसे कि घर-कार्यालय के दरवाजों के हत्थों, मोबाइल, डेस्कटाप सहित पूरी मेज, गाड़ियों के हैण्डल्स को नीम मिश्रित अथवा सामान्य डिटर्जेण्ट से गीले कपड़े से साफ़ करते रहें। फ्रि़ज में रखी वस्तुएँ यथासम्भव न खायें क्योंकि वहाँ सूक्ष्मजीवों की बढ़त कम हो जाती है, रुकती
नहीं है एवं फ्रि़ज की सफाई भी ढंग से हो पानी सम्भव नहीं रहती।

अल्कोहल रहित सैनाइटाइज़र्स का प्रयोग कर सकते हैं, जैसे कि अच्छी तरह से सर्फ़ से धोकर कपड़ों में अंतिम धोवन में उबली नीम-पत्तियों की कुछ बूँदें मिलाना, गौमूत्र, कपूर इत्यादि से निर्मित सैनाइटाइज़र्स का प्रयोग करना इत्यादि।

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