हर्निया होने के कारण व उपचार Hernia Treatment In Hindi

हर्निया होने के कारण व उपचार Hernia Causes Treatment Symptoms In Hindi

Hernia Causes Treatment Symptoms In Hindi

हर्निया क्या है (What Is Hernia) –

हर्निया (Hernia) उस स्थिति को कहते हैं जब कोई भीतरी अंग उस पेशी व ऊतक से निकलने अथवा बाहर की ओर उभरने लगता है जिसमें कि वह थमा हुआ रहता है।

उदाहरणार्थ आँतें आसपास के दुर्बल क्षेत्र को फाड़कर उदर (एब्डामन) क्षेत्र में आ सकती हैं। कई हर्निया (Hernia) उदर में छाती व नितम्बों के बीच हो सकते हैं परन्तु ये ऊपरी जाँघ एवं पेट व जाँघ के संधिस्थल पर भी दिख सकते हैं।

घातकता ? अधिकांश हर्निया (Hernia) तात्कालिक रूप से प्राणघातक नहीं होते परन्तु प्रायः ये अपने आप ठीक नहीं होते। कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि ख़तरनाक जटिलताओं से बचने शल्यक्रिया आवश्यक हो जाये।

Hernia Causes Treatment Symptoms In Hindi

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Hernia

हर्निया के लक्षण (Symptoms Of Hernia ) –

*. हर्निया में सर्वाधिक नज़र आने वाला लक्षण प्रभावित भाग में माँस का ढेला उभर आना होता है। इन्गुइनल हर्निया के मामले में जघनास्थि (प्यूबिक बोन) के किसी एक भाग पर एक माँसल उभार दिख सकता है जहाँ पेट के निचले भाग से जाँघ मिल रही हो। हो सकता है कि लेटते ही माँस का यह उभार सामान्य हो जाये।

*. खाँसते अथवा बैठे हुए छूकर हर्निया को महसूस किया जा सकता है।

*. माँसल उभार के आसपास के क्षेत्र में असहजता व दर्द सम्भव।

*. हिएटल हर्निया जैसे विशिष्ट हर्निया-प्रकारों में अधिक विशिष्ट लक्षण दिख सकते हैं, जैसे कि सीने में जलन, निगलने में परेशानी एवं छाती में दर्द।

*. हर्निया लक्षण-रहित भी हो सकता है, जैसे कि सम्भव है कि सामान्य चिकित्सात्मक जाँच कराये बगैर हर्निया का पता ही न चले अथवा हर्निया का पता तब पड़ा जब किसी अन्य चिकित्सात्मक स्थिति की जाँच करायी जा रही थी।

हर्निया के कारण (Couses Of Hernia) –

हर्निया सम्बन्धित पेशियों की दुर्बलता व खिंचाव जैसे कारणों के संयोजन से हुआ करते हैं। कारण के आधार पर हर्निया एकदम से अथवा धीरे-धीरे विकसित हो सकता है। पेशियों की इस कमज़ोरी व खिंचाव के कुछ कारण निम्नांकित रहे हैं :

1. जन्मजात् – भ्रौणिक परिवर्द्धन के दौरान भी हर्निया विकसित हो सकता है, इस कारण इसमें नवजात हर्नियायुक्त पैदा होता है।
2. ढलती उम्र
3. किसी चोट व शल्यचिकित्सा से हुई क्षति के कारण
4. लम्बे समय तक चली खाँसी अथवा क्रोनिक आब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसआर्डर
5. तनावपूर्ण दबावयुक्त व झटकेदार अथवा शारीरिक असंतुलन वाला शारीरिक श्रम अथवा अधिक भार उठाना
6. गर्भावस्था, विशेषतया एकसाथ अनेक सन्तानों वाला प्रसव
7. कोष्ठबद्धता जिससे आँतों की गति में खिंचाव होने लगता हो
8. मोटापे व अधिक वजन से ग्रसित होना
9. उदर में तरल अथवा एसाइट्स

हर्निया के जोख़िम कारक –

*. हर्निया का निजी अथवा पारिवारिक अतीत
*. सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस
*. तम्बाकूरहित, सहित धूम्रपान, धूम्रपान सहित, रहित तम्बाकू
*. कालपूर्व पैदा नवजात अथवा कमभार वाला नवजात

हर्निया के प्रकार (Types Of Hernia) –

इन्गुइनल हर्निया – इसमें आँत निचली उदरीय भित्ति में कमज़ोर भाग को, विशेषत: इन्गुइनल केनाल को फ़ाड़कर उभर जाती है।

हिएटल हर्निया – इसमें आमाशय का एक भाग चेस्ट-केविटी में डायफ्ऱॅम के माध्यम से उभर आता है। डायफ्ऱॅम पेशी की ऐसी शीट है जो साँस लेते समय संकुचित होती है एवं वायु को फेफड़ों में ले जाती है।

इससे उदर के अंग चेस्ट से अलग रहते हैं। हिएटल हर्निया से लगभग हमेशा ही गेस्ट्रोओएसोफ़ेगल रिफ़्लक्स होता है जिसमें आमाशय के तरल उल्टी दिशा में ग्रासनली में जाने लगते हैं, जलन की अनुभूति होती है।

अम्ब्लिकल हर्निया – यह मुख्यतः बच्चों में होता है जब आँत कमर के पास उदरीय भित्ति से उभरने लगती है। बच्चे के रोते समय यह देखा जा सकता है। यही एकमात्र हर्निया है जो शायद अपने आप ठीक हो जाये क्योंकि उदरीय भित्ति की पेशियाँ 1-2 वर्ष की उमर तक मजबूत होती जाती हैं।

यदि 5 वर्ष की आयुतक भी यह हर्निया ठीक न हो अथवा पहले ही दर्द अथवा अन्य असहजता होती हो तो शल्यक्रिया करानी पड़ सकती है। बढ़े वज़न अथवा गर्भावस्था के कारण अथवा पेट में पानी जमा होने से उदर में खिंचाव होते रहने से बड़ों को भी अम्ब्लिकल हर्निया हो सकते हैं।

वेण्ट्रल हर्निया – उदर की पेशियाँ कहीं से खुल जाने से ऊतक उभरने के कारण यह होता है। इसमें व्यक्ति के लेटने पर वेण्ट्रल हर्निया का आकार घट सकता है।

हर्निया की जाँच (Diagnosis of Hernia) –

प्रथम चरण – शारीरिक परीक्षण के दौरान चिकित्सक उदरीय व श्रोणि क्षेत्र में उभार अथवा माँसल परिवर्तन को समझने का प्रयास करता है जो रोगी के खाँसने, खड़े होने अथवा शारीरिक खिंचाव के समय बढ़ जाता है।

द्वितीय चरण – व्यक्ति का चिकित्सात्मक अतीत पूछा जाता है जिसमें अनेक प्रश्न होते हैं, जैसे कि प्रथम बार यह उभार कब अनुभव हुआ था ? क्या कुछ अन्य लक्षण भी अनुभव हुए ? क्या रोगी को ऐसा लगता है कि किसी स्थिति अथवा कारण से ऐसा हुआ होगा ? जीवनशैली व भार उठाने वाली जीविका के बारे में पूछताछ की जाती है ?

यह भी पूछा जा सकता है कि तथाकथित जिमिंग, बॉडीबिल्डिंग (Body Building) तो नहीं करते (क्योंकि यह भी हानिप्रद है, शारीरिक सक्रियता को नैसर्गिक रूप से बढ़ाना चाहिए, जैसे बैडमिण्टन, रस्सी कूदना, सायकल चलाना)।

धूम्रपान व हर्निया के कौटुम्बिक अतीत के बारे में जानकारियाँ एकत्र करनी आवश्यक हैं। अतीत में पेट अथवा निचले भागों में की गयी शल्यक्रियाओं इत्यादि के विषय में बताना आवश्यक है।

तृतीय चरण – उदरीय अल्ट्रासाउण्ड (शरीर के भीतर की संरचनाओं की इमेज बनाने के लिये High – Frequency Sound Waves का प्रयोग) अथवा City Scane (Image लाने के लिये एक्स-रेज़ (X-Rey) सहित कम्प्यूटर टेक्नोलाजी (Computer Technology) का प्रयोग) अथवा एमआरआई स्केन (इमेज उपजाने के लिये High Rated चुम्बकों व रेडियो तरंगों का संयोजन)।

हिएटल हर्निया का संदेह होने पर Doctor द्वारा अन्य जाँचें सुझायी जा सकती हैं ताकि आमाशय की आन्तरिक अवस्थितियों की गहरी पड़ताल की जा सके. गेस्ट्रोग्रेफ़िन अथवा बैरियम एक्स-रे जिसमें पाचन-पथ के एक्स-रे पिक्चर्स की शृंखला होती है।

ये पिक्चर्स तब रिकार्ड किये जाते हैं जब रोगी ने लिक्विड बैरियम घोल अथवा डायट्रिज़ोएट सोडियम (गेस्ट्रोग्रेफ़िन) व डिएट्रिज़ोएट मेग्लुमिन युक्त तरल का सेवन कर लिया हो।

इन तरलों के कारण एक्स-रे इमेजेज़ (X-Rey images) स्पष्ट दिखती हैं। हिएटल हर्निया की जाँच में एण्डोस्कोपी भी करायी जा सकती है जिसमें गले के माध्यम से ग्रासनली व आमाशय में एक नली डाली जाती है जिसमें कैमरा लगा होता है।

हर्निया शल्यक्रिया ही उपचार (Treatment of Hernia) –

हर्निया का उपचार उसके कारण पर निर्भर होगा, लक्षण यदि मितली, उल्टी अथवा बुखार अथवा अचानक दर्द जैसे गम्भीर हों तो चिकित्सात्मक उपचार आवश्यक हो जाता है।

वास्तव में शल्यक्रिया ही एकमात्र उपचार है। हर्निया बड़ा हो गया हो अथवा पीड़ाप्रद हो तो शल्यचिकित्सक अथवा पेट व आँत रोगविशेषज्ञ द्वारा शल्यचिकित्सा कराने को कहा जा सकता है।

इसमें उदरीय भित्ति में छेद को सिल दिया जाता है। हर्निया को सुधारने के लिये ओपन सर्जरी की जाती है अथवा दूरबीन पद्धति से लेपरोस्कापिक सर्जरी की जा सकती है.

लेपरोस्कापिक सर्जरी में एक छोटा-सा कैमरा एवं मिनिएचराइज़्ड सर्जिकल एक्विप्मेण्ट के प्रयोग से हर्निया की शल्यक्रिया की जाती है जिसमें कुछ छोटे-छोटे चीरे ही लगाये जाते हैं। इस प्रकार आसपास के ऊतक भी कम क्षतिग्रस्त होते हैं।

ओपन सर्जरी में शल्यचिकित्सक हर्निया के स्थान के निकट एक चीरा लगाता है एवं उभरे ऊतक को उदर में ढकेला जाता है, फिर सिलकर क्षेत्र को बन्द कर दिया जाता है।

हर्निया शल्यक्रिया के बाद शल्यक्रिया कराये स्थान में व आसपास पीड़ा अनुभव हो सकती है। ठीक होने तक शल्यचिकित्सक द्वारा निर्धारित औषधियाँ प्रॅस्क्राइब की जा सकती हैं। बुखार, संक्रमण, लालिमा, रिसाव अनुभव होने अथवा दिखने पर उस शल्यचिकित्सक से तुरंत सम्पर्क करना होता है।

हर्निया उपचार के बाद हो सकता है कि सप्ताहों तक व्यक्ति को उठने-बैठने व शारीरिक गति में कष्ट हो अथवा उतनी सहजता से ये गतियाँ न हो पायें.

श्रम, खिंचाव व लगभग चार किलो से अधिक भार उठाने वाली गतिविधियों से यथासम्भव बचने का सुझाव दिया जाता है। इसमें भी भार उठाते व शारीरिक झुकाव मोड़ के समय अत्यन्त सहज रहना होता है, झटके से कुछ नहीं करना है।

हर्निया के घरेलु सावधानियाँ (Home Remedies of Hernia) –

जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है कि हर्निया का उपचार शल्यचिकित्सा ही है परन्तु यदि स्थिति गम्भीर न हो अथवा जटिलता से बचाव करना हो तो पेट व आँत रोग विशेषज्ञ से चिकित्सात्मक उपचार जारी रखते हुए निम्नांकित सावधानियाँ अपनायें.

1. कोष्ठबद्धता को रोकने के लिये खाने में रेशो (साबुत अनाज, फल व सब्जियाँ) की मात्रा बढ़ायें ताकि आँतों की गतियाँ ठीक से हो सकें।

2. ठूँस-ठूँसकर खाने के बजाय छोटे-छोटे कौर धीरे-धीरे चबाकर खायें एवं पर्याप्त से अधिक न खायें, कम खायें तो चलेगा।

3. एसिड रिफ़्लक्स रोकने के लिये तले-मिर्ची भरे पदार्थ कम खायें, टमाटर-आधारित खाद्यों का सेवन कम करें, जंक And फ़ास्ट फ़ूड से यथासम्भव बचकर चलें।

4. धूम्रपान बन्द करें।

5. लगातार अथवा बार-बार खाँसी हो तो Doctor को दिखायें

6. शारीरिक सक्रियता बढ़ायें, नैसर्गिक रूप से।

7. आड़े-तिरछे खड़े होकर अथवा शारीरिक दबाव झेलकर मल-मूत्रोत्सर्ग न करें। उत्सर्जन के समय ज़ोर न डालें तथा हो सके तो भारतीय शैली के शौचालय का प्रयोग करें।

8. यदि आपकी जीविका ही शारीरिक मोड़-झुकावों अथवा भारों की उठापटक से भरी है तो प्रयास करें कि कमर अथवा पेट मोड़कर झुकने के बजाय घुटने मोड़कर झुकें, भार छोड़ते अथवा उठाते समय झटका न लें.

घर में भी यदि 20 लीटर पानी ले जाना हो तो दोनों हाथों में 10-10 लीटर की बाल्टियाँ उठायें ताकि एक ओर शारीरिक तनाव (Physical Stress) न बढ़े व संतुलन बना रहे। एक साथ ख़ूब सारा भार उठाने के बजाय टुकड़ों में भार उठायें।

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