पेट में गैस के लक्षण कारण निवारण जाँचें व उपचार

पेट में गैस के लक्षण कारण निवारण जाँचें व उपचार Gas Pain Symptoms Causes Treatment in Hindi

Gas Pain Symptoms Causes Treatment in Hindi

पेट में गैस क्या है –

पेट में कुछ गैस बननी तो सामान्य ही है परन्तु अधिक गैस बनने को समस्या के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इससे पेट में सूजन, फुलाव अथवा दर्द की समस्या हो सकती है अथवा मलाशय से होकर गैस न निकली तो मुख से भी निकल सकती है। गैस के कई रूप हो सकते हैंः मंद से अन्तराली अथवा गम्भीर से कष्टपूर्ण तक।

चाहे गैस जैसे लक्षण कुछ खाने-पीने के बाद विकसित हो सकते हैं परन्तु हर बार गैस का सम्बन्ध खाने-पीने से होगा ऐसा भी आवश्यक नहीं। गैस कभी-कभी किसी अधिक गम्भीर समस्या का संकेत हो सकती है।

Gas Pain Symptoms Causes Treatment in Hindi

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गैस के लक्षण – 

गैस से पाचन-पथ में व्यवधान आते हैं एवं व्यक्तियों में इनके लक्षण भिन्न-भिन्न हो सकते हैं –

*. डकार अथवा उबकाई
*. पेट में ऐंठन
*. पेट फूलना अथवा पेट भरा होने जैसी अनुभूति अथवा पेट के आकार में फैलाव अथवा उदर आकार में वृद्धि
*. छाती में दर्द
*. गैस से असहजता आ सकती है परन्तु यह प्रायः गम्भीर नहीं होती।
*. मल में रक्त आने को गम्भीर चिह्न मानते हुए तुरंत पेट व आँत रोग विशेषज्ञ से मिलें।
*. अधिकांश मामलों में चिकित्सात्मक उपचार की आवश्यकता नहीं होती तथा कुछ मिनट्स ले सेकर कुछ घण्टों में लक्षणों से राहत मिल जाती है।

आमाशय में गैस के कारण व निवारण

1. यह प्रायः खाने-पीने के दौरान अत्यधिक वायु निगल लेने से होती है। सामान्य रूप से होंठों से गिलास से लगाकर पानी पीयें, मुख ऊपर करके ऊपर से मुख भर-भरकर कुड़ेलते हुए अथवा धार में नहीं; यदि यात्रा में हों तो छोटी-सी गिलास सदैव साथ रखें तथा धीरे-धीरे खायें-पीयें |

2. ड्रिंकिंग स्ट्राज़ का प्रयोग करने से; इनका प्रयोग न करें।

3. खाली पेट रहने से गैस बनती है क्योंकि पेट में पाचक-रस (खाने को पचाने वाला एक प्रकार का अम्ल) बनता रहता है, यदि इसे भोजन नहीं मिला तो यह पेट के आन्तरिक अंगों पर अम्लीय क्रियाएँ करने लगता है जिससे गैस बनती है, अतः खाली पेट न रहें। मार्ग में हों अथवा कोई समस्या हो तो उसके लिये पूर्वतैयारी के रूप में गुड़पट्टी, छुहारे जैसे पौष्टिक खाद्य रखें, चिप्स-नमकीन तो आग में घीं का ही कार्य करेंगे।

4. ढीली फ़िटिंग वाली कृत्रिम दंतावली से भी वायु अधिक मात्रा में भीतर पहुँच सकती है, कृत्रिम दंतावली लगायी हुई हो तो अपने दंतचिकित्सक से मिलते एवं उससे उसे मुख में ठीक से फ़िट कराते रहें |

5. सोडा अथवा कार्बोनेटेड पेय पी लेने से; सोडा, बीयर्स इत्यादि मद्यों व कार्बोनेटेड बेवरेजेज़ से दूर रहें |

6. कृत्रिम मिठास व अन्य स्वादवर्द्धकों व परिरक्षकों (प्रिज़र्वेटिव्स), नूडल्स, सेब, सोफ़्ट-ड्रिंक्स, शुगर-अल्कोहाॅल, साॅर्बिटाॅल व मॅल्टिटाॅल से पेट में फुलाव, पेटदर्द व गैस की समस्या उपजती है, इनसे दूरी बरते।

7. हार्ड कैण्डी चूसने से, इससे परहेज करें।

8. चेविंगगम चबाने से, इसे न चबायें।

9. धूम्रपान करने से, धूम्रपान त्यागें।

यदि गैस की समस्या चल रही हो तो ठीक होने तक पनीर, ब्रेड, आइसक्रीम से भी परहेज करें।

आँत में गैस – यदि डकार के माध्यम से गैस बाहर न आ पावै तो यह आन्त्रों में चली जाती है जहाँ यह अधोवायु (फ़्लेट्युलेन्स) के रूप में गुदा से बाहर निकल सकती है। आहार का पाचन प्राथमिक रूप से छोटी आँत में होता है, यहाँ से पचा आहार कालान में चला आता है जहाँ जीवाणुओं, कवकों व यीस्ट की सहायता से उसका किण्वन (फ़र्मेण्टेषन) होता है जिससे मीथेन व हायड्रोजन बनती है।

बड़ी आँत में गैस – बड़ी आँत में गैस तब विकसित होती है जब सामान्य जीवाणुओं द्वारा कुछ प्रकारों के अपचित खाद्यों का विखण्डन किया जाता है।कुछ खाद्यों की अपेक्षा अन्य खाद्य अधिक सरलता से पच जाते हैं। शर्करा, रेशे व कुछ मण्डों (स्टाच्र्स) जैसे कुछ कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन छोटी आँत में नहीं होता है।

ये पदार्थ बड़ी आँत में जाते हैं जहाँ सामान्य जीवाणुओं द्वारा इन्हें विखण्डित किया जाता है। इस नैसर्गिक प्रक्रिया में हायड्रोजन, कार्बन डाई-आक्साइड एवं कुछ मीथैन गैस उत्पन्न होती है जो कि मलाषय से निकल सकती है। इसीलिये कुछ खाद्य विशेष खाने के बाद गैस के लक्षण अधिक अनुभव हो सकते हैं।

गैस-उत्पत्ति करने वाली अन्य स्थितियाँ –

गैस कभी-कभी किसी पाचन-स्थिति का संकेत हो सकती है, जैसे कि –

*. इन्फ़्लेमेटरी बावेल डिसीस – पाचन-पथ में दीर्घकालिक जलन-सूजन के लिये इस शब्द-समूह का प्रयोग किया जाता है जो कि कई कारणों से हो सकता है, जैसे कि अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रान्स रोग से। लक्षणों में दस्त, भार घटना एवं गैस-दर्द जैसे लगने वाले उदरीय दर्द सम्मिलित हो सकते हैं।

*. इरिटेबल बावेल सिण्ड्राम – यह ऐसी स्थिति है जब बड़ी आँत प्रभावित होती है व बहुत-से लक्षण आते हैं, जैसे कि पेट में ऐंठन, फुलाव, गैस, दस्त, कब्ज़।

*. छोटी आँत में जीवाण्विक वृद्धि – इस स्थिति से छोटी आँत में अत्यधिक जीवाणु होते हैं। इससे आँतों की आस्तर क्षतिग्रस्त भी हो सकती है जिससे पोषकों को अवशोषित करना शरीर के लिये कठिन हो सकता है। लक्षण – आमाशय में दर्द, फूलन, दस्त, कब्ज़, गैस, उबकाई अथवा डकार।

*. खाद्य-असहिष्णुता – दुग्ध-शर्करा (लॅक्टोज़) अथवा कुछ अनाजों में पाये जाने वाले ग्लुटेन से यदि व्यक्ति का पाचन-तन्त्र संवेदनशील हो तो हो सकता है कि शरीर इन्हें सरलता से पचा न पाये। इन सामग्रियों से बने उत्पादों का सेवन करने से गैस अथवा उदर-पीड़ा अनुभव हो सकती है।

*. मलबद्धता – कम बावेल एक्टिविटी से उदर में गैस बन सकती है, इससे गैस-दर्द व पेट में फुलाव सम्भव है। मलबद्धता को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है कि सप्ताह में तीन बावेल मूवमेण्ट्स से कम होना। रेशेदार सामग्रियों के सेवन व शारीरिक सक्रियता नैसर्गिक रूप से बढ़ाते हुए इन आन्त्रीय संकुचनों को प्रेरित किया जा सकता है एवं मलबद्धता दूर की जा सकती है।

*. गेस्ट्रोइसोफ़ेगल रिफ़्लक्स डिसआर्डर – यह तब होता है जब आमाशय का अम्ल उलट दिशा में ग्रासनली (इसोफ़ेगस) में प्रवाहित होने लगता है। इस विकार से ये समस्याएँ हो सकती हैं – सीने में जलन बनी रहना, मितली, उबकाई-उल्टी, आमाशय में दर्द, अपच जो गैस जैसा लगे।

*. आन्तरिक हर्निया – यह तब होता है जब कोई आन्तरिक अंग उदर की पर्युदर्या-गुहिका (पेरिटोनियल-केविटी) में छिद्र में उभर आता है। इस स्थिति के लक्षणों में अन्तराली उदरपीड़ा, मितली व उल्टी सम्भव।

*. कालान-कैन्सर – अतिरेक गैस कालान-कैन्सर का आरम्भिक चिह्न हो सकती है जो कि बड़ी आँत में विकसित होने वाला एक कैन्सर है।

पेट फूलन व उदरपीड़ा क्यों ?

उदर में वायु अथवा गैस भरने से पेट फूलने की समस्या होती है। इससे पेट का आकार चैड़ा अथवा फूला हुआ लग सकता है। इसे छूने से पेट कठोर अथवा कसा हुआ-सा लग सकता है।

असहजता व उदरपीड़ा सम्भव। कारणों में लॅक्टोज़-असहिष्णुता, एसिड रिफ़्लक्स, कब्ज़, आन्त्रीय अवरोध, अपच (डिस्पेप्सिया), विषाण्विक गेस्ट्रोएण्टॅराइटिस (स्टमक-फ़्लु), प्रिमेन्स्ट्रुअल सिण्ड्राम, सेलियक रोग अथवा ग्लुटेन-असहिष्णुता, हर्निया विशेष तौरपर हिएटल हर्निया, एच. पाएलोरी अथवा इष्चॅरिचिया कोलाई संक्रमण, कालिक एण्ड क्राइंग, डायवर्टिक्युलाइटिस, इरिटेबल बाउल सिण्ड्राम, ओवेरियन सिस्ट, पित्ताश्मरी, एण्डोमेट्रियोसिस, मूत्रपथ-संक्रमण, एपेण्डिसाइटिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस, एक्टापिक प्रेग्नेन्सी, क्रा’न्स रोग, पेरिटानाइटिस, गियार्डियासिस, हूकवर्म संक्रमण, अमीबियासिस, आमाशय ओवेरियन कैन्सर, सिस्टिक फ़ायब्रोसिस, नान-होड्जकिन्’स लिम्फ़ोमा, शार्ट बावेल सिण्ड्राम।

पेट फूलने अथवा उदरपीड़ा के साथ ये लक्षण दिखने पर भी स्थिति गम्भीर हो सकती हैः अतिरेक अथवा अनियन्त्रित उल्टी अथवा दस्त, उल्टी के साथ रक्त, मल में रक्त, बेहोशी, तीन दिन तक बावेल गति न होना, पेट फूलने अथवा उदरपीड़ा के प्रकरण में पेट व आँत रोग चिकित्सक के पास तब भी जायें जब लगभग हर बार भोजनोपरान्त पेट में असहजता हो जाती हो, मितली होने लगती हो, बावेल मूवमेण्ट्स कष्टपूर्ण हों अथवा पीड़ापूर्ण यौनसम्बध हों।

कहाँ दर्द का क्या संकेत ?

उदर के विभिन्न क्षेत्रों में दर्द के संकेत भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। उदरीय कष्ट छाती व श्रोणिप्रदेष (पेड़ू) के बीच कहीं भी हो सकता है। लोग प्रायः इसे आमाशय कह दिया करते हैं। यह दर्द कई प्रकार का हो सकता है- ऐंठन जैसा, दुःखना, ढीला-सा दर्द, तीक्ष्ण दर्द।

पेट फूलने व दर्द के कारण सौम्य से गम्भीर हो सकते हैं। पेट फूलने व दर्द की परेशानी अधिकांशतया इन कारणों से होती हैः अधिक खा लेने, गैस, तनाव, अपच से। इस प्रकार का दर्द प्रायः सामान्य रहता है व दो घण्टों में दूर हो जाता है।

आमाशय -फ़्लु के मामले में तेज दर्द अथवा फूलन की अनुभूति हो सकती है जो उल्टी अथवा दस्त के दौरान हर बार जाती व फिर से आ जाती है। आमाशय -विषाणु (Stomach virus) प्रायः अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

पेट फूलने अथवा दर्द के विभिन्न स्थानों से जुड़े अंग –

उदर का बायीं ओर –

ऊपरी बायाँ- उदर के इस भाग में आमाशय का काफ़ी भाग होता है, अग्न्याषय (पैंक्रियाज़) की पुच्छ सहित प्लीहा(स्प्लीन) यहाँ है। प्लीहा ऐसा अंग है जो रुधिर का निस्यन्दन(छनन) भी करता है।

केन्द्रीय बायाँ व केन्द्रीय मध्य- आड़ी बड़ी आँत व छोटी आँत से उदर का केन्द्रीय बायाँ व केन्द्रीय मध्य भाग बनता है। छोटी आँत में अधिकांश  खाने का पाचन होता है। आड़ी बड़ी आँत बड़ी आँत का ऊपरी भाग है जहाँ अनवशोषित खाद्य बड़ी आँत में चढ़ने के बाद पहुँचता है। छोटी आँत से उदर का अधिकांश भाग बना होता है।

निचला बायाँ- डिसेण्डिंग व सिग्मायड कालान के भागों से पाचन-तन्त्र का वह भाग बनता है जहाँ अनवशोषित बचा खाद्य एवं अपअपशिष्ट शरीर को छोड़ते तक संचित होता है।

उदर का मध्यभाग –

ऊपरी मध्य – उदर के ऊपरी मध्यभाग में यकृत, आमाशय का कार्डियक रीजन, आमाशय का एक भाग, आमाशय का पाएलोरिक रीजन एवं अग्न्याषय होता है।

यकृत रुधिर को निस्यन्दित करता है एवं पित्त का निर्माण करता है जो कि ऐसा पदार्थ है जो आहार में आये वसा का विखण्डन व अवशोषण करने में सहायता करता है।

आमाशय के कार्डियक रीजन में आहार ग्रासनली से प्रवेश करता है।

आमाशय का पायलोरिक रीजन आमाशय का अन्तिम भाग है, इसके बाद खाद्य छोटी आँत के डुओडिनम में जाता है।

अग्न्याशय (पैंक्रियाज़) एक बड़ा ग्रंथिकीय अंग है जो पाचक-विकरों (डायजेस्टिव-एन्ज़ाइम्स) व हार्मोन्स को रिलीज़ करता है।

निचला मध्य- उदर के निचले मध्यभाग में मूत्राशय मलाशय व गुदा है।

मूत्राषय में मूत्र उत्सर्जन के लिये एकत्र हो जाता जाता है- मूत्रमार्ग (यूरेथ्रा) द्वारा निकल जाने तक।

मलाषय गुदा तक होता है जो कि बड़ी आँत का अन्तिम भाग है जिसमें शरीर से उत्सर्जन तक मल संचित रहता है।

उदर का दायाँ प्रश्र्व –

ऊपरी दायाँ- उदर के ऊपरी दायें पाष्र्व में पित्ताषय, यकृत व छोटी आँत का पहला भाग होता है।

पित्ताशय ऐसा कोष/आशय/थैला है जो यकृत द्वारा निर्मित पित्त को भण्डारित करता है।

डुओडिनम (छोटी आँत का प्रथम भाग) में आमाशय से खाली हुआ भोजन छोटी आँत में आता है।

केन्द्रीय दायाँ – उदर के केन्द्रीय दायें पाष्र्व में एसेण्डिंग कालान व आड़ा कालान है। अब खाना एसेण्डिंग कालान से आड़े कालान में जाता है।

निचला दायाँ – इस क्षेत्र में बड़ी आँत की अंधान्त्र (केकम) सहित एपेण्डिक्स व छोटी आँत है। अंधान्त्र (केकम) बड़ी आँत का पहला भाग है जो छोटी आँत के छोर से जुड़ता है।

उदर में फूलन व दर्द हेतु जाँचें –

सम्पूर्ण ब्लड-काउण्टः इसमें रुधिर में विभिन्न कोशिकाओ के स्तर परखे जाते हैं ताकि संक्रमण की उपस्थिति अथवा किन्हीं कोशिका विशेष की कमी देखी जा सके।

मूत्र-परीक्षण – मूत्रपथ इत्यादि के संक्रमणों की जाँच इस प्रकार की जाती है, गर्भावस्था की जाँच भी इसमें सम्मिलित।

मल-विष्लेषण – पाचन-तन्त्र में किसी संक्रमण अथवा समस्या को समझने के प्रयास के रूप में मल में असामान्यताओं को जाँचा जा सकता है।

इमेजिंग टेस्ट – उदरीय अंगों में संरचनात्मक असामान्यताओं को परखने के लिये एक अथवा अनेक इमेजिंग टेक्नोलाजीज़ अपनायी जा सकती हैं, जैसे कि रेडियेशन इमेजिंग- फ़्लुओरोस्कापिक इमेजिंग, प्लेन फ़िल्म एक्स-रे, सीटी स्कॅन। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार की इमेजिंग भी प्रयोग की जा सकती हैं, जैसे – एमआरआई स्कॅन अथवा दौड़ना। अल्ट्रासोनोग्रॅफ़ी में हाथ से एक उपकरण से धनि-तरंगें त्वचा की सतह पर उत्सर्जित की जाती हैं ताकि शरीर के भीतर दिखे।

पेट फूलने के साथ कमरदर्दः पीठ का निचला भाग शरीर का भार वहन करने के साथ ही पेट के निचले हिस्से को थामने में भी मुख्य भूमिका निभाता है.

यदि पेट फूलना व कमरदर्द एकसाथ होते हों तो कुछ रोगों की जाँचें अलग से करवानी पड़ सकती हैंः सेलियक रोग अर्थात् ग्लुटेन से प्रतिरक्षा-तन्त्र की असामान्य प्रतिक्रिया के कारण हुआ पाचन-विकार, फ़ाइब्रोमायल्जिया (पेशीय व अस्थियों में फैला एक दर्द जिसके लक्षणों में थकान भी सम्मिलित), अण्डाशयी कैन्सर, पोलियोमायलिटीज़।

पेट में फुलाव व कमरदर्द एकसाथ होने के और भी कारण हो सकते हैं- जलोदर/एस्साइट्स (उदर में तरल जमा होने की यह समस्या अन्य समस्या का संकेत हुआ करती है), ओवेरियन कार्सिनोमा जैसे कैन्सर ट्यूमर, क्रानिक पैंक्रियाटिस अथवा पैंक्रियाटिक कैन्सर, यकृत-रोग, जठरान्त्र पथ-संक्रमण, आन्त्रीय अवरोध अथवा पेट के भीतर किसी अंग में छेद अथवा गर्त।

साँस लेने में कठिनता, मतिभ्रम, बेहोषी, अनियन्त्रणीय उल्टी, मूत्र में रक्त, सिरदर्द, सीने में जलन, बुखार अथवा ठण्ड लगने, थकावट बिन कारण बनी रहने, खुजली व फफोलेदार चकत्ते, पीड़ापूर्ण अथवा बारम्बार/आकस्मिक मूत्रोत्सर्ग जैसे मामलों में भी गम्भीर होना जाना चाहिए।

पेट में फुलाव/दर्द व कमरदर्द साथ में होने से जुड़ी जाँचों में मूलभूत रक्त-परीक्षण व इमेजिंग सम्मिलित हैं। कमरदर्द में तात्कालिक राहत पाने के लिये बर्फ़ अथवा ठण्डे पानी को पैकेट में भरकर सिंकाई, झटके से झुकने व उठने सहित अचानक भार उठाने से परहेज, परिजनों से कमर की मालिश कराना, बैठते व खड़े होने समय सही आसन का प्रयोग करें।

गैस अथवा पेट फूलने व उदरपीड़ा के उपचार –

1. उदाहरणार्थ जीवाण्विक संक्रमण की स्थिति में पेट व आँत रोगविशेषज्ञ प्रतिजैविक दे सकता है।

2. कारण यदि आन्त्रीय अवरोध है तो मौखिक आहार घटाते हुए विशेषज्ञ बावेल रेस्ट कराकर परीक्षण कर सकता है। यदि जठरान्त्र (पेट व आँत) पथ में अंशो की गति में कोई विघ्न लगे तो विशेषज्ञ कुछ ऐसी औषधियाँ सुझा सकता है जिनसे आन्त्रीय गति को बढ़ावा मिल सकता हो। जटिल उदाहरणों में शल्यचिकित्सा आवश्यक हो सकती है।

पेट की गैस के घरेलु उपचार –

3. जलसहित नैसर्गिक तरलों का सेवन बढ़ायें;

4. एस्पिरिन, इबुप्रोफ़ेन व अन्य नान-स्टेरायडल एण्टि-इन्फ़्लेमेटरी ड्रग्स जैसी दर्द निवारक इत्यादि दवाओं का सेवन न करें, अन्यथा गेस्ट्रिक अल्सर अथवा आन्त्रीय अवरोध जैसी उदरीय स्थिति के कारण यदि समस्या हुई तो यह और बढ़ सकती है।

5. अजवायन, जीरा, सौंफ, सौंठ, हींग, पुदीना, लौंग की मात्राएँ बढ़ायें, बिस्किट यदि खाते हों तो ये साबुत अनाज से निर्मित हों व अजवायन आदि पदार्थ इनमें भी मिले हुए हों। चाय पीते हों तो उसमें भी सौंफ व लौंग अवश्य मिलायें।

6. कुछ घण्टे कठोर भोजन न करते हुए नर्म भोजन ही करें।

7. अत्यधिक चर्बीदार, मसाले-मिर्ची-तैलयुक्त भोजन न करें।

8. कृत्रिम स्वादवर्द्धक युक्त पेय व खाद्य पदार्थों का सेवन न करें;

9. माँसाहार, जंक व फ़ास्ट व डिब्बाबंद फूड से दूरी बरतें।

10. इकट्ठा ढेर सारा न खाते हुए कम-कम मात्रा में अनेक बार खायें तथा खाते-पीते समय बातें करने से बचें।

11. बैठकर मनुष्यों जैसे भोजन करेंः एक पटे पर अथवा उल्टे टब पर थाली रखकर आती-पालती बनाकर भूमि पर बैठकर

12. विशेष रूप से रात के खाने के बाद बैठें अथवा लेटें नहीं, थोड़ा चल-फिर कर आयें, फिर कुछ मिनट्स बायीं करवट लेकर फिर सोयें।

13. नैसर्गिक रूप से शारीरिक सक्रियता बढ़ायें, जैसे सायकल, रस्सी कूदना, दौड़ना, सीढ़ी चढ़ना, पैदल चलना।

14. मन से सप्लिमेण्ट्स इत्यादि का सेवन न करें।

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