बार – बार पेशाब आने के कारण जाँचें व उपचार

बार – बार पेशाब आने के कारण जाँचें व उपचार Frequent Urination Causes Remedies In Hindi

Frequent Urination Causes Remedies In Hindi

बार – बार पेशाब आना क्या है ?

हम सभी में मूत्राशय होता है जो पर्याप्त अवधि तक मूत्र को संचित रख सकता है जिससे अधिकांश व्यक्ति प्रतिदिन सामान्यतया चार से आठ बार पेशाब करने जाते हैं परन्तु इससे अधिक पेशाब करने की इच्छा अथवा पेशाब के लिये रात में उठने की आवश्यकता पड़ने को बार बार पेशाब आना कहा जाता है जिसमें मूत्राशय पूर्णतया भरे बिना ही उत्सर्जन की आवश्यकता अनुभव होने लगती है जो कि किसी गम्भीर स्वास्थ्य-समस्या का संकेत हो सकता है।

प्रायः बारम्बार या आकस्मिक मूत्रोत्सर्ग किसी अन्य समस्या का लक्षण न होकर स्वयं में एक समस्या के रूप में होता है। अतिसक्रिय मूत्राशय संलक्षण – ओवरेक्टिव ब्लैडर सिण्ड्राम में अनैच्छिक मूत्राशयी संकुचन होते हैं जिनसे बारम्बार व बहुधा आकस्मिक मूत्रोत्सर्ग की आवश्यकता जैसी अनुभूति होने लगती है।

Frequent Urination Causes Remedies In Hindi

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Frequent Urination

बार – बार पेशाब आने के कारण

1. वृक्करोग – इसमें बारम्बार मूत्रोत्सर्ग की आवश्यकता के साथ बुखार रहता है एवं मूत्र त्यागने की आवश्यकता आकस्मिक रूप से अनुभव होती है एवं उदर में दर्द अथवा असहजता होती है। मूत्रपथ-संक्रमण सम्भव।

2. मधुमेह – इसमें बारम्बार मूत्रोत्सर्ग की स्थिति के साथ मूत्र की मात्रा असामान्य रूप से अधिक होती है एवं ऐसा अधिकांशतया टाइप 1 एवं टाइप 2 डायबिटीज़ दोनों के आरम्भिक लक्षण के रूप में पाया गया है क्योंकि शरीर उपयोग से बचे ग्लुकोज़ को मूत्र के माध्यम से बाहर निकालने का प्रयास करता है।

3. गर्भावस्था – गर्भावस्था के आरम्भिक सप्ताहों में आकार में बढ़ रहे गर्भाशय से मूत्राशय पर दबाव पड़ता है व बारम्बार मूत्रोत्सर्ग की स्थिति आती है।

4. प्रोस्टेट समस्याएँ – प्रोस्टेट की आकार वृद्धि से मूत्रनली (शरीर से मूत्र को बाहर ले जाने वाली नली) पर दबाव पड़ सकता है एवं मूत्र का प्रवाह अवरुद्ध हो सकता है। इससे मूत्राशय की भित्ति विक्षोभ्य अथवा संवेदनशील हो जाती है। कम मात्रा में मूत्र होने पर भी मूत्राशय संकुचित होने लगता है जिससे मूत्रोत्सर्ग की जरूरत लगने लगती है।

5. इण्टरस्टीशियल सिस्टाइटिस – अज्ञात कारण की इस स्थिति में मूत्राशय व श्रोणिक क्षेत्र में दर्द होता है। अधिकांशतया लक्षणों में मूत्रोत्सर्ग की आकस्मिक एवं बारम्बार आवश्यकता सम्मिलित होती है।

6. मूत्रवर्द्धक प्रयोग – मूत्रवर्द्धक (डाइयूरेटिक्स) का प्रयोग मूत्र निर्माण की प्रक्रिया बढ़ाकर किसी रोग में राहत दिलाने में किया जाता है। उच्चरक्तचाप, वृक्क में तरल-जमाव एवं शरीर में अतिरेक तरल को बाहर करने के लिये मूत्रवर्द्धकों का प्रयोग किया जाता है जिनसे बारम्बार मूत्रोत्सर्ग की आवष्यकता अनुभव होती है।

7. स्ट्रोक अथवा अन्य तन्त्रिकीय रोग – मूत्राशय में जाने वाली किन्हीं तन्त्रिकाओं को क्षति पहुँचने से मूत्राशय के कार्य प्रभावित हो सकते हैं, मूत्रोत्सर्ग हेतु आकस्मिक रूप से जाने अथवा बारम्बार जाने की इच्छा हो सकती है।

8. मूत्राशय-कैन्सर

9. मूत्राशय की कार्यप्रणाली में व्यवधान

10. मूत्राशय की पथरी – वृक्क की पथरी के ही समान मूत्राशय में भी पथरी बन सकती है यदि मूत्र में उपस्थित खनिज मिलकर छोटे व कठोर कणों का निर्माण कर लें तो। स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में ऐसा अधिक होता है। बारम्बार मूत्रोत्सर्ग की आवश्यकता के साथ जलन एवं उदरीय क्षेत्र में असहजता सम्भव।

11. विकिरण-चिकित्सा

12. पेल्विक ट्यूमर बनना

13. स्त्री के पेल्विक अंग ढहकर योनि के माध्यम से बाहर आने को हों

बार – बार पेशाब आने की जाँच क्यों आवश्यक ?

मूत्रोत्सर्ग आकस्मिक अथवा बारम्बार होने से यदि जीवनशैली पर प्रभाव पड़ने लगे अथवा बुखार, पीठदर्द, पेट के एक तरफ़ दर्द, उल्टी, सर्दी, भूख वृद्धि अथवा प्यास वृद्धि, थकान, रक्त युक्त अथवा धुँधला मूत्र, शिष्न/योनि से डिस्चार्ज जैसे लक्षण हों तो जाँच आवश्यक है। शारीरिक परीक्षण सहित चिकित्सात्मक अतीत को खँगालते हुए इन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट होने आवश्यक हैं.

किसी औषधि का सेवन किया जा रहा है ? कोई अन्य लक्षण अनुभव हो रहा ? नींद से उठकर मूत्रोत्सर्ग के लिये जाना पड़ता है ? बिस्तर पर मूत्रोत्सर्ग हो जाता है ? मूत्र का रंग पहले से हल्का अथवा गहरा लगने लगा है ? क्या आप अल्कोहल अथवा कैफ़ीनयुक्त पेय पीते हैं ? कुछ जाँचें

*. मूत्र-विश्लेषण – मूत्र के सूक्ष्म दर्शीय परीक्षण में कई जाँचें की जाती हैं ताकि मूत्र के माध्यम से होकर गुजर रहे विभिन्न यौगिकों का पता उनकी मात्रा सहित लगाया जा सके।

*. सिस्टोमेट्री – इसमें मूत्राशय के भीतर दबाव का मापन यह देखने के लिये किया जाता है कि मूत्राशय अपना कार्य ठीक से कर रहा है कि नहीं, सिस्टोमेट्री में यह पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि पेषी अथवा तन्त्रिका सम्बन्धी किसी समस्या से तो मूत्राशय द्वारा मूत्र रोकने व निकालने की क्षमता प्रभावित नहीं हो रही।

*. सिस्टोस्कापी – इस जाँच में सिस्टास्कोप नामक पतले, प्रकाषयुक्त उपकरण के द्वारा मूत्राशय व मूत्रमार्ग के भीतर देखा जाता है। वैसे यूरोडायनॅमिक्स में कई जाँचें एक साथ की जाती हैं – सिस्टोमेट्री, यूरोफ़्लोमेट्री, यूरेथ्रल प्रेशर इत्यादि।

*. तन्त्रिकीय परीक्षण – किसी तन्त्रिका-विकार की उपस्थिति को समझने के लिये न्यूरोलाजिकल टेस्ट्स।

*. अल्ट्रासोनोग्रॅफ़ी – इस इमेजिंग परीक्षण में ध्वनितरंगों के प्रयोग से आन्तरिक दैहिक ढाँचे को देखने का प्रयास किया जाता है।

*. उदर व श्रोणिका का प्लैन फ़िल्म अथवा सीटी स्केन

*. यौन-संक्रामक रोगों की जाँच

बार – बार पेशाब आने के उपचार

1. अतिसक्रिय मूत्राशय को सामान्य करने के लिये – ब्लैडर रिट्रैनिंग करें जिसमें मूत्रवेग को कुछ सीमा तक सहन करने की आदत बनायें ताकि मूत्राशय इस हेतु तैयार हो सके.. कैफ़ीन, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, चोकोलेट, कृत्रिम मिठास व मसालेदार खाद्यों-पेयों का सेवन कम करें तथा अल्कोहल पूर्णतः त्यागें।

2. कब्ज़ दूर करें – खाने में रेशो की मात्रा बढ़ायें ताकि पेट नियमित रूप से साफ होता रहे क्योंकि पेट साफ न होने से भी मूत्राशय भरा-भरा लगने की समस्या बढ़ सकती है।

3. मलमूत्र रोकने जैसे तरीके में अपने उत्सर्जी अंगों की पेशियों को इच्छा मात्र से भीतर संकुचित करने का अभ्यास करें ताकि मूत्राशय व मूत्रनली इत्यादि वहाँ की पेषियों का मूत्र-संधारण सामथ्र्य बढ़े।

4. मधुमेह है तो इसका उपचार करने के लिये रक्त-शर्करा स्तर को नियन्त्रण में लाने के उपाय।

5. खाने के लिये कुछ औषधियाँ चिकित्सकानुसार।

6. अन्तःक्षेपण (Injection) में कुछ औषधियाँ।

7. शल्यक्रियाएँ – सबसे सरल शल्यक्रिया में त्वचा के ठीक नीचे छोटे-छोटे नर्व-स्टिम्युलेटर्स रख दिये जाते हैं। इनके द्वारा पेल्विक फ़्लोर को नियन्त्रित करने वाली तन्त्रिकाओं को उद्दीप्त किया जाता है ताकि पेल्विक फ़्लोर में पेषियों व अंगों में संकुचनों का परिचालन किया जा सके.

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