फ़्लू के प्रकार लक्षण जाँच उपचार व सावधानियाँ Flu Symptoms Types Causes Treatment In Hindi

फ़्लू के प्रकार लक्षण जाँच उपचार व सावधानियाँ Flu Symptoms Types Causes Treatment In Hindi

Flu Symptoms Types Causes Treatment In Hindi

फ़्लू क्या है –

इन्फ़्लुएन्ज़ा अथवा फ़्लू (Flu) वास्तव में विषाण्विक संक्रमण से होने वाला एक श्वसन-रुग्णत्व (साँस की बीमारी) है। यह अत्यधिक संक्रामक होता है एवं साँसों द्वारा बिन्दुकों (ड्राप्लेट्स) के माध्यम से फैल जाता है। हाथ मिलाने, स्पर्श करने अथवा व्यक्ति की साँसों के सम्पर्क में आने मात्र से भी यह फैल सकता है।

फ़्लु के प्रकार –

1. इन्फ़्लुएन्ज़ा ऐ – सीज़्नल एपिडॅमिक्स, इन्फ़्लुएन्ज़ा ऐ के कुछ प्रभेद (स्ट्रैन्स) जैसे कि एच5 एन1 बर्डफ़्लू वायरस कभी-कभी मनुष्यों को भी संक्रमित कर देते हैं जिससे वे गम्भीर रूप से बीमार पड़ सकते हैं। विशेषज्ञ इन पर नज़र रखे रहते हैं ताकि इनमें बदलाव को एवं लोगों पर पड़ रहे प्रभावों का पूर्वानुमान किया जा सके। इन्फ़्लुन्ज़ा ऐ विषाणुओं को उन अनुवंशकों (जीन्स) के आधार पर उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है जिनसे उनके सर्फ़ेस-प्रोटीन्स बने होते हैं।

2. इन्फ़्लुएन्ज़ा बी – सीज़्नल एपिडॅमिक्स, यह एवं उपरोक्त पहला विषाणु ह्यूमन इन्फ़्लुएन्ज़ा वायरसेज़ हर साल सीज़्नल फ़्लु एपिडॅमिक्स करते हैं।

3. इन्फ़्लुएन्ज़ा सी – हल्के स्तर की साँस की बीमारी

Flu Symptoms Types Causes Treatment In Hindi

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Flu se kaise bachav Kare

फ़्लु के लक्षण –

1. ताप बढ़ना जो 3-4 दिन तक रह सकता है (किन्तु बिना बुखार भी फ़्लू हो सकता है)
2. बुखाररहित ठण्ड
3. ठण्ड लगकर बाद में पसीना आना व कँपकँपी
4. बंद अथवा बहती नाक
5. सूखी खाँसी
6. बदन में कहीं भी दर्द जो गम्भीर हो सकता है
7. सिरदर्द
8. थकान एवं असहज लगना
9. भूख में कमी
10. साँस लेना कठिन पड़ना
11. छाती अथवा पेट में दबाव अथवा दर्द
12. सिर चकराना, मतिभ्रम होना अथवा सजगता में कमी
13. दौरा पड़ना
14. मूत्रोत्सर्ग में कमी जो कि निर्जलीकरण / dehydration का अर्थात् शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है
15. गम्भीर दर्द, कमज़ोरी एवं असंतुलन
16. बुखार अथवा खाँसी जो समाप्त हो जाये व फिर वापस आ जाये
17. पहले से चली आ रही अन्य स्वास्थ्य-स्थितियों का बिगड़ना
18. मितली, उल्टी व दस्त जैसी पेट-समस्याएँ
19. साँस लेने में कठिनता
20. तेज साँसें
21. नीला पड़ता चेहरा अथवा ओष्ठों में नीलापन
22. छाती में दर्द अथवा साँस लेते समय पसलियाँ भीतर की ओर खिंचना
23. गम्भीर दर्द
24. पानी की कमी, जैसे कि यदि आठ घण्टों से मूत्रोत्सर्ग न किया हो एवं रोते-रोते अश्रु सूख गयें हो
25. सजगता में कमी अथवा दूसरों से संवाद में कमी
26. कुछ तेज बुखार
27. बुखार अथवा खाँसी जो ख़त्म तो हो जाये परन्तु फिर आ जाये
28. अन्य चिकित्सात्मक स्थितियों का बिगड़ना विशेषतः शिशुओं में
29. बहुत थकावट
30. खाँसी व गले में सूजन
31. बन्द अथवा बहती नाक
32. 12 सप्ताह से कम उम्र में किसी भी प्रकार का बुखार
33. चकत्तों के साथ बुखार
34. दस्त अथवा उल्टी अथवा गम्भीर अथवा लगातार उल्टी
35. उन्हें पकड़ने पर वे झँझलायें
36. धूसर (ग्रे) अथवा नीले रंग की त्वचा
37. साँस लेने में कठिनता अथवा तेज साँसें
38. लक्षण जो आते हों व ठीक होकर फिर आ जाते हों
39. पानी की कमी के लक्षण, जैसे कि पर्याप्त मूत्रोत्सर्ग न करना
40. सोते रहना अथवा आसपास प्रतिक्रियाएँ कम करना
41. बुखार व ठण्डी लगना
42. सिरदर्द
43. पेशियों में दर्द
44. थकान
45. कमज़ोरी लगना
46. बन्द अथवा बहती नाक
47. ख़राब गला व खाँसी

फ़्लु की जाँच –

1. गले की खुरचन को जाँचकर

2. रेपिड इन्फ़्लुएन्ज़ा डायग्नास्टिक टेस्ट जिसमें 10-15 मिनट्स में परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं परन्तु सम्भव है कि वे सटीक न हों। अधिक सटीक परिणाम चाहिए तो अधिक समय वाली जाँचें आवश्यक होती हैं।

कुछ अन्तर –

श्लेष्मा (म्यूकस) व बलगम (फ्लेग्म) में अन्तरः श्लेष्मा (म्यूकस) व बलगम (फ्लेग्म) एकजैसे होकर भी अलग हैं, श्लेष्मा नाक व साइनसेज़ से पतला स्राव है। बलगम तो गले व फेफड़ों से निकला गाढ़ा स्राव है। श्लेष्मा स्पष्ट व चिपचिपा तरल है जिसे नासिका, मुख व कण्ठ के आस्तर (लाइनिंग) ऊतकों में श्लेष्म-ग्रंथियों द्वारा उत्पादित किया जाता है।

बलगम व कफ़ तो श्लेष्मा का एक प्रकार है जिसे फेफड़ों व निचले श्वसन-पथ द्वारा उत्पादित किया जाता है। बलगम होने से फेफड़े व वायुमार्गों (एयरवेज़) में सूजन व इरिटेशन का पता चलता है।

श्लेष्मा मुख्यतया नासिका से निकलती है जबकि बलगम खाँसने के दौरान फेफड़ों से निकलती है।

कोल्ड को भी समझना आवश्यक है जो कि एक संक्रमण है जो मुख्यतः विषाणु से होता है जो ऊपरी श्वसन-तन्त्र का रोग है जिसमें नाक व गले पर प्रभाव पड़ता है।

200 भिन्न प्रकार के विषाणुओं से कोल्ड होता पाया गया है जिनमें से अधिकांश तो र्हाइनोवायरस होते हैं अर्थात् मुख्यतया नाक को प्रभावित करते हैं।

साइनस-संक्रमण में साइनसेज़(मुण्डी के भीतर चार जोड़ी ग्रंथियाँ) में सूजन आ जाती है जिसे साइनुसाइटिस कहते हैं जो कि एक जीवाण्विक संक्रमण है किन्तु यह विषाणु अथवा कवक से भी हो सकता है।

फ़्लु व कोल्ड में समानताएँ- फ़्लु एवं कोल्ड के कुछ लक्षण समान होने से इनें असमंजस हो सकता हैः बहती अथवा बन्द नाक, गले में ख़राबी, खाँसी, सीने में असहजता एवं थकान।

फ़्लु व कोल्ड में अन्तर –

  •  कोल्ड में बुखार नहीं होता जबकि फ़्लु में प्रायः होता है
  • कोल्ड के लक्षण धीरे-धीरे आते हैं जबकि फ़्लु के लक्षण तेजी से विकसित हो सकते हैं
  • फ़्लु की अपेक्षा कोल्ड के लक्षण साधारणतया कम गम्भीर होते हैं
  • फ़्लु होने के बाद व्यक्ति को कई सप्ताहों तक थकान अनुभव होती रहे ऐसा सम्भव है
  • फ़्लु से जटिलताएँ आने की सम्भावना अधिक रहती है एवं ये प्राणघातक हो सकती हैं.

फ़्लु एवं फ़ूड-पायज़निंग में अन्तर –

विषाणुओं के कई प्रकार होते हैं जिनमें से कुछ से पाचन-तन्त्र पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थितियों को लोग कभी-कभी पेट का फ़्लुः स्टमक-फ़्लु बोल देते हैं।

यह बीमारी उस इन्फ़्लुएन्ज़ा से अलग होती है जो कि एक श्वसन-रोग है। स्टकम-फ़्लु मुख्यतया नोरोवायरस से होता है जो संदूषित खाने-पीने से शरीर में प्रवेश कर आते हैं। इसके लक्षणों में जी मिचलाना, उल्टी व दस्त सम्मिलित हैं। खाद्य-विषाक्तता में भी ऐसे लक्षण आते हैं।

खाद्य-विषाक्तता ऐसा रोग है जो विषाणुओं, जीवाणुओं, आविषों (टाक्सिन्स), परजीवियों अथवा रसायनों वाले आहार एवं पेय का सेवन कर लेने से होता है परन्तु स्टमक-फ़्लु (स्टकम बग – गेस्ट्रोएण्टॅराइटिस) एक अविशिष्ट (नान-स्पेसिफ़िक) शब्दसमूह है जिसमें खाद्य-विषाक्तता सम्मिलित हो सकती है। वैसे भी स्टमक – फ़्लु प्रायः विषाण्विक होता है व कुछ दिनों तक रहता है (अल्पकालिक होता है)।

फ़्लु व प्न्यूमोनिया में अन्तर –

प्न्यूमोनिया जीवाण्विक (बैक्टीरियल) अथवा विषाण्विक हो सकता है। इसके लक्षण फ़्लु के लक्षणों जैसे हो सकते हैं परन्तु व्यक्ति को छाती में काँटे गड़ने जैसा तीक्ष्ण दर्द हो सकता है विशेषतया तब जब गहरी साँस ली जा रही हो अथवा खाँसी आयी हो। जीवाण्विक प्न्यूमोनिया धीरे-धीरे अथवा अचानक शुरु हो सकता है।

लक्षणों में बहुत अधिक तापक्रम, पसीना, तेज साँसें व धड़कन, आक्सीजन की कमी से नाखूनों के नीचे का आधार पीला पड़ना जैसे लक्षण सम्मिलित हो सकते हैं। विषाण्विक प्न्यूमोनिया के लक्षण फ़्लु के समान हैंः बुखार, सूखी खाँसी, सिरदर्द, बदन-दर्द एवं कमज़ोरी की अनुभूति। फ़्लु के विपरीत प्न्यूमोनिया के लक्षण प्रायः धीरे-धीरे विकसित होते हैं।

टान्सिलाइटिस – मानव-शरीर में टान्सिल्स के तीन समूह होते हैं। गले के दायें-बायें दो लिम्फ़-नोड्स के रूप में जो टान्सिल्स होते हैं, वे श्वास व भोजन के साथ आये रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। टान्सिल्स में बहुत सारी श्वेतरक्त कोशिकाएँ होती हैं। फ़्लु का प्रसार टान्सिल्स में होने से टान्सिलाइटिस हो सकता है; वैसे अन्य कई विषाणुओं, जीवाणुओं इत्यादि से टान्सिलाइटिस(टान्सिल्स में सूजन) सम्भव है।

फ़्लु सीज़न क्या है ?

फ़्लु होने को तो कभी भी हो सकता है परन्तु फ़्लु सीज़न में अधिक होता है। फ़्लु सीज़न की अवधि व समय पिछले साल से अलग हो सकता है परन्तु यह प्रायः सर्द व ठण्डे मौसम में होता है। फ़्लु सक्रियता अधिकांशतया अक्टूबर में बढ़ने लग जाती है एवं मई तक रह सकती है। वैसे दिसम्बर से फ़रवरी तक यह सर्वाधिक रहती है।

चिकित्सात्मक उपचार के साथ घरेलु उपचार –

चूँकि फ़्लु विषाणुओं के कारण होता है इसलिये प्रतिजैविक (एण्टिबायोटिक्स) प्रभावी नहीं होते। चिकित्सक प्रतिजैविक भी लिख सकता है यदि फ़्लु के साथ में कोई जीवाण्विक (बैक्टीरियल) संक्रमण भी हुआ हो तो। विषाणुरोधी (एण्टिवायरल) औषधियों का सेवन कराया जाता है। साथ मेंः-

1. बुखार कम करने के लिये की गिलोय की डाली के छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी में उबालकर पीयें.

2. एस्पिरिन हानिप्रद सिद्ध हो सकता है, विशेषतया 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को इसका सेवन करने से रेये-सिण्ड्राम नामक समस्या उपज सकती है तथा अन्य आयुवर्गों में भी विभिन्न औषधियों से हृदयरोग की सम्भावना हो सकती है, अतः बिना विशेषज्ञ के औषधीय स्तर पर कुछ सेवन न करें। गले व नाक को ठीक रखने के लिये नीलगिरि के पत्तों का पानी में उबालकर धुआँ लें एवं मुलहठी दुचलकर चबायें.

3. लोगों से शारीरिक दूरी बरतें ताकि दूसरों में संक्रमण न फैले.

4. तरल-सेवन बढ़ायें.

5. मद्यपान न करें.

6. धूम्रपान से दूरी बरतें, अन्यथा जटिलताएँ बढ़ सकती हैं.

7. हर्बल चाय पीयें.

8. विटॅमिन्स से भरपूर भोजन करें; जैसे कि हरी तरकारियाँ-भाजियाँ एवं भूमि के भीतर बनने वाली सब्जियाँ व फल.

9. फ़्लु शाट/फ़्लु जेब्स अर्थात् इन्फ़्लुएन्ज़ा टीकों का प्रयोग इन्फ़्लुएन्ज़ा विषाणुओं के संक्रमण से बचाव में किया जा सकता है किन्तु ये 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं हैं एवं इन टीकों के रूपान्तरों को साल में दो बार विकसित किया जाता है क्योंकि इन्फ़्लुएन्ज़ा विषाणु बहुत तेजी से बदलता है। अतः साफ़-सफाई व अन्य दिनचर्यात्मक सावधानियाँ प्रभावी हो सकती हैं.

10. स्वच्छता रखेंः केवल अपने शरीर नहीं बल्कि आसपास के माहौल की भी.

11. हर्बल व स्थानीय ताजे शाकाहारों द्वारा प्रतिरक्षा-तन्त्र सुदृढ़ बनायें.

12. फ़्लुयुक्त लोगों एवं भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों से दूर रहें, अनावश्यक आयोजनों में न जायें.

फ्लू की संक्रमण शीलता –

फ़्लु विषाणु तरल के बिन्दुकों – ड्राप्लेट्स आफ़ लिक्विड्स के माध्यम से फैलते हैं। खाँसने, छींकने, बात करने अथवा साँसमात्र लेने से भी 6 फ़िट दूर खड़े व्यक्ति में भी यह विषाणु फैल सकता है। संक्रमण के लक्षण दिखने के एक दिन पहले से लेकर लक्षण दिखना आरम्भ होने के 5-7 दिन बाद तक व्यक्ति दूसरों में संक्रमण फैलाने में सक्षम रहता है।

दुर्बल प्रतिरक्षा-तन्त्र के लोगों, वृद्धों व छोटे बच्चों द्वारा विषाणु को इस अवधि से अधिक समय तक फैलाया जा सकता है। फ़्लु लक्षणों के दिखने के बाद आरम्भिक 3-4 दिवसों में सर्वाधिक संक्रामक होता है। व्यक्ति अपनी नाक व अपने मुख को स्पर्श करके अपने विषाणु को आसानी से आसपास फैला सकता है।

इन्क्यूबेशन पीरियड – इसका तात्पर्य किसी रोग की वह अवधि है जो रोग होने से लेकर उसके लक्षण दिखना आरम्भ होने के बीच होती है। फ़्लु के मामले में यह इन्क्यूबेशन पीरियड 2 दिनों का होता है परन्तु 1 से 4 दिन भी हो सकता है। गर्भावस्था में फ़्लुः गर्भावधि के दौरान फ़्लु संक्रमण अधिक घातक हो सकता है क्योंकि प्रतिरक्षा-तन्त्र में परिवर्तन आ रहे होते हैं।

फ़्लुग्रस्त गर्भवती को चिकित्सालय में अधिक समय तक भर्ती रहने की आवश्यकता पड़ सकती है। फ़्लु के कारण गर्भावस्थासम्बन्धी ये जटिलताएँ आ सकती हैंः समय से पहले प्रसव एवं कम भार का नवजात। फ़्लु नवजातों के लिये प्राणघातक हो सकता है। गर्भवती को ब्रोंकाइटिस, कान व रक्त संक्रमणों को जोख़िम रहता है।

लक्षण कब तक ? फ़्लु-लक्षण तेजी से आते हैं। एक सप्ताह में अधिकांश लक्षण मिट जाते हैं परन्तु खाँसी दो सप्ताहों तक चल सकती है। कुछ मामलों में व्यक्ति लक्षण समाप्त होने के बाद भी एक सप्ताह और संक्रामक रह सकता है।

फ़्लु यदि नहीं गया तो व्यक्ति को दीर्घकालिक स्वास्थ्य-समस्याओं से जूझना पड़ सकता है, जैसे कि वृक्क-वैफल्य। अधिकांश व्यक्तियों में लक्षण समाप्त होने के बाद एक सप्ताह अथवा अधिक अवधि तक पोस्ट-वायरल थकान अनुभव हो सकती है। सुस्ती अथवा अस्वस्थ होने जैसी स्थिति बनी रह सकती है।

फ़्लु का कालक्रम –

  • विषाणु व्यक्ति को उसकी प्रायः नासिका अथवा मुख से संक्रमित करता है.
  • एक दिवसोपरान्त व्यक्ति दूसरों में संक्रमण फैला सकता है.
  • संक्रमण के 1-2 दिन बाद लक्षण आने लगते हैं.
  • लक्षण दिखने शुरु होने के बाद 3-4 दिनों तक संक्रमण फैलने की सम्भाववना सर्वाधिक होती है.
  • 4 दिन बाद बुखार व पेषियों में दर्द से आराम मिलता है.
  • एक सप्ताह बाद अधिकांश लक्षण गायब हो जाते हैं.
  • विषाणु फैलने का जोख़िम लक्षणों के दिखना आरम्भ होने के बाद 5-7 दिन बाद नहीं रहता.
  • खाँसी व थकान आगामी एक सप्ताह और रह सकती है.

सावधानियाँ – फ़्लु प्रायः गम्भीर नहीं होता परन्तु परेशान कर देने वाला रहता है। कुछ लोगों में जटिलताएँ हो सकती हैं, जैसे साथ में जीवाण्विक प्न्यूमोनिया, पानी की कमी सम्भव। मधुमेह, अस्थमा व कन्जेस्टिव हार्ट-फ़ैल्योर जैसी दीर्घकालिक चिकित्सा-स्थितियाँ बिगड़ सकती हैं। साइनस-समस्याएँ व कान के संक्रमण सम्भव।

आयु 65 वर्ष से अधिक अथवा कम उम्र में बच्चों सहित गर्भवतियों, हृद्वाहिकागत रोगग्रस्त लोगों, अस्थमा अथवा ब्रोंकाइटिस जैसी सीने में समस्याओं से ग्रसित लोगो वृक्क रोग अथवा मधुमेह से ग्रसित व्यक्तियों एवं स्टेरायड्स सेवन कर रहे लोगों सहित कैन्सर का उपचार करा रहे लोगों व दुर्बल प्रतिरक्षा-तन्त्र के लोगों के लिये फ़्लु अधिक हानिप्रद सिद्ध हो सकता है।

कभी-कभी फ़्लु का नया प्रकार जैसे कि H5N1 उभर-उभर आता है जिसे Bird Flu कहते हैं। सोष्यल डिस्टेन्सिंग, अपनी पर्सनल हायजीन सहित आसपास की भी साफ़-सफ़ाई, अनावश्यक कहीं आने-जाने से परहेज, मास्क का प्रयोग जैसे सीधे-सरल तरीके यदि सदैव अपनायें तो फ़्लु जैसे सर्दी-ज़ुकाम-खाँसी रोगों सहित अन्य बहुत सारे संक्रामक रोगों से दूर रहा जा सकता है।

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