कान के दर्द के कारण व निराकरण Ear Pain Causes And Treatment In Hindi

कान के दर्द के कारण व निराकरण Ear Pain Causes And Treatment In Hindi

Ear Pain Causes And Treatment In Hindi

कान मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से एक है, वैसे तो एक कान भी पर्याप्त होता परन्तु ईश्वर ने अनुग्रहवश दो कान प्रदान किये हैं जो बाहर की ध्वनियों को सुनकर सतर्क होने, समझने व सीखने के काम आते हैं.

कान ध्वनि-तरंगों के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं जहाँ से मस्तिष्क प्रतिक्रिया करते हुए हाथ-पैर आदि इन्द्रियों को तदनुसार कार्य करने को निर्देशित करता है। कान-दर्द के अधिकांश मामलों में कानदर्द का कारण किसी स्थानविशेष तक सीमित होता है एवं बाह्यकर्ण समस्याओं व अन्तःकर्ण समस्याओं में वर्गीकरण कर सकते हैं।

बाह्यकर्ण-समस्याएँ टिम्पेनिक मैम्ब्रेन के बाहर होती है जिनमें ओटाइटिस एक्स्टर्ना, ईयर-कॅनाल फ़ारन बाडीज़, ईयरवॅक्स एवं मेस्टोइडाइटिस सम्मिलित हैं। कभी-कभी फुंसी हो जाने से भी कान में दर्द हो सकता है। अन्तःकर्ण समस्याएँ टिम्पेनिक मैम्ब्रेन के अन्दर अथवा उससे गहराई में होती हैं जिनमें एक्यूट ओटाइटिस मीडिया (अधिकतर इसी वर्ग के कानदर्द होते हैं) व इयुस्टॅषियान ट्यूब डिस्फ़ंक्षन सम्मिलित है।

टिम्पैनिक मैम्ब्रेन में चोट भी लग सकती है, जैसे कि बेरोट्रामा से अथवा कान में सीधे कुछ टकराने अथवा प्रवेष कराने से; बेरोट्रामा में स्क्यूबा डाइविंग अथवा पानी में तैरने से अथवा अन्य किसी कारण से वायु अथवा जल अथवा गैस का दाब परिवेष की अपेक्षा असामान्य रूप से बढ़ या बदल जाने से टिम्पैनिक मैम्ब्रेन को चोट पहुँचती है, इसमें पूरा शरीर प्रभावित होता है।

कान के दर्द में यह बात पहले ही समझ लेनी आवश्यक है कि नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञसे जाँच कराये बिना ही लक्षणों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर न पहुँचें क्योंकि ऐसा भी पाया गया है कि जबड़े अथवा किसी दाँत में उत्पन्न दर्द को भी कान में अनुभव किया जाना सम्भव है तथा ऐसे कई लक्षण हो सकते हैं जो कान से जुड़े होकर भी कान से जुड़े न लग रहे हों, जैसे कि शारीरिक संतुलन बिगड़ना। इस कारण इस आलेख को ध्यान से पढ़ेंः-

Ear Pain Causes And Treatment In Hindi

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Ear Pain

कान के दर्द के लक्षण –

1. ईयर कॅनाल से डिस्चार्ज
2. अपने कान से स्वयं को अथवा पास से गुजरे व्यक्ति को दुर्गन्ध का अनुभव
3. कान में भीतरी अथवा बाहरी सूजन
4. सुनने में असहजता अथवा कम सुनायी देना अथवा कानों में अजीब आवाज़ें सुनायी देना जिनका कोई स्रोत बाहर नहीं है
5. बुखार
6. कान भरा-सा लगना
7. ठीक से सोने में परेशानी
8. कान में उठापटक अथवा खिंचाव
9. सिरदर्द
10. कान की समस्या यदि बच्चों में हो तो विशेष सतर्कता से उसे समझना आवश्यकहै क्योंकि वह न बता पाने की स्थिति में हो सकता है कि रोये जा रहा हो अथवा सोता न हो अथवा उठकर असहज लगता हो अथवा चिड़चिड़ाहट दिख रही हो, ख़ुराक़ कम हो गयी हो, शारीरिक असंतुलन दिखता हो इत्यादि।

कान के दर्द के कारण –

संक्रमणः कान में दर्द प्रायः किसी संक्रमण से हुआ करता है, यह संक्रमण बाह्य, मध्य व अन्तःकर्ण में हुआ हो सकता है; जैसे कि मध्यकर्ण में संक्रमित तरल जिसमें जीवाण्विक अथवा विषाण्विक रोगप्रद हों.

बाह्यकर्णसंक्रमण तैरने, पानी में सिर तक डूबने, शावर से नहाते समय ग़लत मुद्राएँ अपनाने से कान में पानी दबाव से अथवा अनावश्यक रूप से चले जाने, हियरिंग ऐड अथवा हेडफ़ोन्स लगाने से हो सकता है जिससे ईयर-कॅनाल के भीतर की त्वचा क्षतिग्रस्त हो सकती है अथवा हाथ अथवा काड़ियों इत्यादि सामग्रियों से कान खुजलाने इत्यादि से भी बाह्यकर्ण-संक्रमण होते रहते हैं।

ईयर कॅनाल में त्वचा खुरच जाने अथवा वहाँ हल्का-सा भी कुछ लग जाने से संक्रमण हो सकता है एवं कान के भीतर गया पानी त्वचा को नाज़ुक बना देता है जिससे जीवाणुओं व कवकों (फफूँद/फ़न्जाई) को पनपने का आसान अवसर मिल जाता है। मध्यकर्ण-संक्रमण में श्वसन-पथ-संक्रमण से स्टेम का संक्रमण होता है। ऐसे संक्रमणों से ईयरड्रम्स के पीछे तरल बन जाने भी सूक्ष्मजीवों पैदा हो सकते हैं।

अतः कर्ण विकार का एक उदाहरण लेबिरिन्थिस है जो कभी-कभी श्वसन-बीमारी से विषाण्विक अथवा जीवाण्विक संक्रमणों से हो जाता है जिसके लक्षणों में वेस्टिब्युलो काक्लियर नर्व क्षतिग्रस्त होने से सुनायी देना कम हो जाने, मन घबराने व सिर चकराने जैसे लक्षण अनुभव हो सकते हैं.

*. हो सकता है कि अन्तःकर्ण में तरल भर जाये। कानदर्द गले के ऐसे जीवाण्विक संक्रमणों से भी हो सकता है जो खाँसने के दूसरों में भी फैल सकते हैं अथवा साइनस-संक्रमण से भी कानदर्द होते पाये गये हैं।

*. घावः वाहन चलाते समय कोई कंकड़ अन्दर चले जाने अथवा भीतर आये कीट आदि को निकालने के लिये लकड़ी अथवा रूईयुक्त काड़ी से कान खँगालने से .

*. एक्टर्नल आडिटरी कॅनाल की सूजन (प्रायः संक्रामक).

*. मध्यकर्ण में असंक्रमित तरल की उपस्थिति जो प्रायः एलर्जी अथवा अपर रेस्पिरेटरी ट्रॅक्ट इन्फ़ेक्षन से इयुस्टॅषियान ट्यूब के ब्लाकेज से होती है.

*. तैरने इत्यादि के कारण बाहर के परिवेश से तुलना में कान के वायु,जल व गैसों के दाब में परस्पर असंतुलन.

*. कान में मोम बहुत अधिक एकत्र हो जाना.

*. कान में कोई बाहरी वस्तु जाने-अनजाने में प्रवेश कर गयी हो.

*.  नहाते अथवा मुँह धोते समय कान में चला गया साबुन अथवा शेम्पू.

*. कान में अँगुली अथवा अन्य सामग्रियाँ डालने से.

*. टेम्पोरोमेण्डिब्युलर जायण्ट सिण्ड्राम.

*. छिद्रिल कान का पर्दा.

*. जबड़ों को प्रभावित कर रहा आथ्र्राइटिस.

*. संक्रमित दाँत.

*. बाहर चेहरे पर लगा आघात् दाँतों में लगने से.

*. ईयर-कॅनाल में एग्ज़िमा.

*. ट्राईजेमिनल न्यूरेल्जिया (क्रानिक फ़ैषियल नर्व-पैन).

कान के दर्द के बचाव में सावधानियाँ –

1. धूम्रपान त्यागें तथा सेकण्डहैण्ड स्मोक से भी बचकर रहें.

2. कान में कोई समस्या होने पर अपनी अन्य इन्द्रियों (जैसे कि हाथ की अँगुलियाँ अथवा उपकरण/तीलियाँ, तैल) का प्रयोग न करते हुए बुद्धि का प्रयोग करते हुए कान के चिकित्सक से जाँच करायें.

3. सोने से पहले धूल-खेन इत्यादि झटकार दें एवं हेल्मेट भी साफ़ रखें.

4. कभी कान में कोई कीटादि चले आने जैसा लगे तो एकान्त में शान्त स्थान पर किसी छोटी-सी नर्म व ग़ैर-नुकीले छोर वाली टहनी को कान में हल्का-सा भीतर प्रवेश करायें जिसपर चलकर कीट वापस बाहर सरलता से आ जायेगा.

5. तैरना पड़ा हो अथवा कान में पानी चले जाने जैसा लगे तो सामान्य सूती कपड़े से हाथ (न कि अँगुलियों की नोक बनाकर) से कान को बाहर-ही-बाहर हल्की हथेली से पौंछने की चेष्टा करें, बस।

चिकित्सात्मक उपचार और अधिक आवश्यक हो सकता है यदि कान से बहाव हो रहा हो जिसमें मवाद अथवा रक्त दिखे,तेज बुखार, सिरदर्द, चक्कर आना, कान में कुछ अटकने जैसी अनुभूति, कान के पीछे सूजन हो अथवा कान के पर्दे के फटने का संकेत समझा जाने वाला ऐसा तेज दर्द हो रहा हो जो अचानक रुक जाये, 24 से 48 घण्टों में बेहतर अथवा बदतर अनुभव होने जैसे लक्षणों के साथ कानदर्द हो रहा हो।

सर्वप्रथम कान की यान्त्रिक सफ़ाई की जाती है ताकि भीतर जमा मैल व मवादादि यथासम्भव बाहर निकाला जा सके, अधिकांश रोगियों को इतने में भी बहुत आराम मिल जाता है, वैक्यूम व सक्षन प्रोसिजर के साथ ऐसा किया जा सकता है; यह माँग रोगी स्वयं भी कर सकता है (जैसे कि डेण्टल क्लीनिंग की माँग वह स्वयं कर सकता है)।

चिकित्सक द्वारा दिये खाने व कान में डालने वाले प्रतिजैविकों से यदि लाभ न होता दिखे अथवा समस्या पुनः उभर आये तो कुछ स्थितियों में वह मिरिंगोटामी कर सकता है जिसमें ईयरड्रम में छोटा-सा छिद्र किया जाता है ताकि पानी, रक्त अथवा मवाद जो भी भीतर हो वह बाहर निकल पाये।

ऐसा भी सम्भव है कि एक नली कान में प्रवेश करायी जाये ताकि बाहर आते तरल वापस भीतर न चले जायें। इस नली से दर्द घटता है, सुनने की क्षमता में सुधार आ सकता है, संक्रमणों की संख्या में कमी आ सकती है.

छोटे बच्चों में यदि ऐसा किया जाना आवश्यक हो तो ईयर-ट्यूब्स लगाते समय एक छोटी-सी शल्यक्रिया करनी होती है जिसमें बच्चे को एक प्रकार से सुलाकर लगभग 15 मिनट्स की कार्यविधि सम्पन्न करनी होती है। कान के संक्रमणों को रोकने के लिये टान्सिल्स हटाये भी जा सकते हैं।

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