स्तन कैन्सर के लक्षण कारण बचाव जाँचें व उपचार

स्तन कैन्सर के लक्षण कारण बचाव जाँचें व उपचार Breast Cancer Symptoms Causes Stages Types In Hindi

Breast Cancer Symptoms Causes Stages Types In Hindi

स्तन-कैन्सर (Breast Cancer) स्तन की कोशिकाओं में होने वाला ऐसा कैन्सर है जिससे Cells अनावश्यक व असामान्य वृद्धि करने लगती हैं। यह स्त्री व पुरुष दोनों को हो सकता है परन्तु तुलनात्मक रूप से स्त्रियों में आशंका बहुत अधिक रहती है।

आरम्भिक स्तर पर घर में स्वयं ही स्तनों के रूपरंग व बनावट में परिवर्तन अथवा छूने पर कहीं गाँठ जैसी अनुभूति होने की स्थिति में स्तन कैन्सर (Breast Cancer) को आरम्भ में ही समझकर शीघ्र जाँचें कराते हुए उपचार की ओर बढ़ा जा सकता है।

Breast Cancer Symptoms Causes Stages Types In Hindi

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Breast Cancer

स्तन-कैन्सर के लक्षण –

1. स्तन पर या उसके आसपास गठान अथवा कुछ अलग-सा अनुभव होना
2. उसके आकार, आकृति अथवा रूप में कोई बदलाव
3. उसके आसपास की त्वचा में किसी प्रकार का धँसाव अथवा रंग-परिवर्तन
4. स्तनाग्र का मुड़ना अथवा नीचे की ओर ऐंठना

स्तन-कैन्सर के कारण –

अनुसंधानकर्ताओं ने स्तन-कैन्सर के कुछ हार्मोनल, जीवनशैलीगत व पारिवेशिक कारकों की पहचान में सफलता पा ली है किन्तु यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कुछ व्यक्तियों में इस Cancer की आशंका अधिक क्यों होती है। ऐसा आकलन है कि स्तन-कैन्सर आनुवंशिक बनावट एवं परिवेश के जटिल मिश्रण से होता है.

1. वंशागत स्तन-कैन्सर – पूर्वसम्बन्धियों में अण्डाशय अथवा Breast Cancer का अतीत रहा हो तो आगामी पीढ़ियों में भी इनकी आशंका अधिक पायी जाती है। अतः जाँच के दौरान एवं उपचार के भी लिये अतीतों का चिकित्सात्मक विश्लेषण किया जाना जरूरी है।

2. स्त्री होना – पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को स्तन-कैन्सर की आशंका अत्यधिक होती है।

3. बढ़ती आयु – आयु बढ़ते-बढ़ते स्तन-कैन्सर की आशंका अधिक होती जाती है।

4. विकिरण का सम्पर्क – यदि महिला ने बचपन या किशोरावस्था में किसी प्रकार का विकिरण-उपचार कराया हो या किन्हीं जाँचों के लिये विकिरणों से होकर गुजरना पड़ता रहा हो तो Breast Cancer का जोख़िम बढ़ जाता है।

5. मोटापा – भारी होना अपने आप में ब्रेस्ट-कैन्सर का एक जोख़िम है।

6. अल्पायु में मासिक स्राव आरम्भ हो गये हों – 12 वर्ष की आयु से पहले ही मासिक स्राव आरम्भ हो गया हो तो स्तन-कैन्सर की आशंका अधिक रहती है।

7. देर से रजोनिवृत्ति – सामान्य से अधिक आयु में रजोनिवृत्ति हो तो ब्रेस्ट कैन्सर होने की आशंका बढ़ती है।

8. अधिक आयु में प्रथम सन्तानोत्पत्ति – 30 वर्षायु के बाद पहली सन्तान जन्मी हो तो Breast Cancer की आशंका अधिक हो सकती है।

9. कभी गर्भधारण न किया हो – गर्भधारण कभी न करने वाली स्त्रियों में एक या अधिक बार गर्भधारण कर चुकी स्त्रियों की अपेक्षा स्तन-कैन्सर की सम्भावना अधिक होती है।

10. रजोनिवृत्तिउपरान्त हार्मोन चिकित्सा – रजोनिवृत्ति के लक्षणों के उपचार के प्रयास में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरान के मिश्रण वाली हार्मोन-थिरॅपी करा रही स्त्रियों में स्तन-कैन्सर का जोख़िम बढ़ जाता है एवं यह हार्मोनल थिरेपी बन्द कराने पर जोख़िम घट जाता है।

11. मद्यपान – मद्यपान से स्तन-कैन्सर की आशंका अधिक हो जाती है।

ब्रेस्ट-कैन्सर से बचाव –

1. मद्यपान व धूम्रपान से दूर रहें।

2. शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, ऐसा न सोचें कि काम कर तो रहे है या घर के काम करके पर्याप्त सक्रियता हो जाती है। अलग से रस्सी कूदें, साईकल चलायें।

3. यदि बच्चा हो तो उसे दूध पिलाती रहें, इससे स्तन-कैन्सर की आशंका घटती है।

4. स्वस्थ बच्चेदानी व अण्डाशयों को निकलवा दिया जाये तो Breast Cancer सहित कई कैन्सरों से बहुत सीमा तक बचाव हो जाता है।

ब्रेस्ट-कैन्सर से जुडी जाँचें –

1. मॅमोग्रॅम : इस इमेजिंग परीक्षण में स्तन की सतह को परखा जाता है। 40 वर्ष अथवा अधिक आयु की कई महिलाएँ कुछ देषों में वार्षिक स्तर पर यह जाँच कराती हैं। ट्यूमर या संदिग्ध धब्बे के संकेत नज़र आने पर भी यह जाँच सुझायी जा सकती है। यदि कुछ असामान्य लगा तो आगे अन्य परीक्षण कराने को कहा जाता है।

2. अल्ट्रासाउण्ड : इसमें ध्वनि-तरंगों से स्तन को गहराई तक जाँचा जाता है।

3. एमआरआई

4. ब्रेस्ट-बायोप्सी : इसमें स्तन के भाग विशेष से कुछ ऊतक निकालकर अनेक प्रकार की ब्रेस्ट-बायोप्सीज़ के लिये भेजे जा सकते हैं। ऐसी कुछ बायोप्सीज़ में स्तन में एक चीरा लगाने की भी आवश्यकता पड़ सकती है।

ब्रेस्ट-कैन्सर का उपचार –

यदि ट्यूमर हुआ तो उसके आकार, स्टेज व ग्रेड (कि उसके बढ़ने व फैलने की सम्भावना कितनी है) के अनुसार उपचार का तरीका चुना जाता है.

1. शल्यचिकित्सा : अधिकांश मामलों में शल्यक्रिया ही मुख्य रूप से की जाती है। इसमें आवश्यकतानुसार स्तन के प्रभावित भाग को अथवा पूरे स्तन को निकाल दिया जाता है।

2. कीमोथिरेपी : इसमें कैन्सर-कोशिकाओं के नाश के लिये कुछ औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इसे प्रायः शल्यचिकित्सा के साथ अपनाया जाता है।

कुछ स्थितियों में रोगी को शल्यचिकित्सा से पहले कीमोथिरेपी की जाती है ताकि ट्यूमर के आकार के घटने की सम्भावना बने एवं शल्यचिकित्सा में अधिक चीड़-फाड़ न करनी पड़े। कीमोथिरेपी में अचानक पूरे शरीर के बाल झड़ने जैसे प्रभाव पड़ते हैं जिनके बारे में रोगी को पहले ही सब बता देना चिकित्सक का दायित्व है।

3. लक्ष्यबद्ध चिकित्सा : इसमें कोशिकाओं द्वारा चयनित Proteins के उत्पादन में अवरोध लाने के लिये विशिष्ट ड्रग्स का प्रयोग किया जाता है ताकि कैन्सर-कोशिकाओं की बढ़त का नाश किया जा सके।

4. विकिरण : इसमें विकिरण की हाई-पावर्ड बीम्स का प्रयोग करते हुए कैन्सर-कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। अधिकांश विकिरण-उपचारों में बाहरी बीम-रेडिशषन का प्रयोग किया जाता है, इस युक्ति में शरीर के बाहर एक बड़ी मशीन रखी होती है।

कुछ प्रकरणों में आन्तरिक विकिरण करना जरुरी समझा जाता है जिसे ब्रेकिथिरेपी भी कहते हैं जिसमें चिकित्सक द्वारा रेडियोऐक्टिव सीड्स अथवा पेलैट्स को शरीर में भीतर ट्यूमर वाली जगह के पास रख दिया जाता है जहाँ वे कुछ समय रहते हुए कैन्सर-कोशिकाओं का नाश करते रहते हैं।

5. हार्मोन थिरेपी

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