शरीर के अंगो से जुड़े हुए भ्रम व वास्तविकताएँ

विभिन्न अंगों से जुड़े औषधीय दावे एवं वास्तविकताएँ Body Parts Real Facts Myth In Hindi

Body Parts Real Facts Myth In Hindi

प्रिण्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया में ऐसे विज्ञापनों की भारी भरमार है जहाँ बाल, त्वचा इत्यादि अंगों व शारीरिक स्थितियों में बदलाव लाने के दावे किये जाते हैं जो कि सर्वथा भ्रामक एवं मूर्खतापूर्ण हैं।

ये व्यापारिक संगठन प्रत्येक शारीरिक स्थिति को कोई न कोई बीमारी अथवा विकार घोषित कर देते हैं तथा फर्जी सर्वेक्षणात्मक व वैज्ञानिक आँकड़े पेश करते हैं एवं भ्रामक उत्पादों व उपकरणों इत्यादि का भयंकर मायाजाल फेंकते हैं जिनमें अब कोई न फँसे इसलिये यह आलेख लिखा जा रहा है.

Body Parts Real Facts Myth In Hindi

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Body Parts Facts Myth

1. सिर पर बाल उगाने काले बाल लाने सम्बन्धी शरीर से बाल हटाने सम्बन्धी :

वास्तव में के शमूल (बालों की जड़) जितनी गहरी होती है वहाँ तक आमतौर पर कोई दवाई पहुँच ही नहीं सकती। इसके अतिरिक्त शरीर में किस पोषक की कमी अथवा अधिकता से बालों पर प्रभाव पड़ रहा है बिना रक्त जाँचे यह जानना कैसे सम्भव ?

बिना विशेषज्ञीय जाँचों के तैल-दवा लगा-खाकर आप बालों सहित सम्पूर्ण स्वास्थ्य को जोख़िम में डाल रहे हैं। बाल हार्मोनल इत्यादि गतिविधियों से उगते हैं, उनके उगने में अवरोध लाकर त्वचा को बीमार न बनायें।

2. स्तन बढ़ाने वाली क्रीम्स :

स्तनों का आकार जितना बढ़ना होता है किशोरावस्था में बढ़ चुका होता है, किशोरावस्था के दौरान ऐसे किसी उत्पाद का प्रयोग करना हानिप्रद होगा एवं बाद में कोई असर नहीं होगा, वैसे वास्तव में स्तन यदि असामान्य स्तर पर इतने छोटे हों कि वास्तव में शल्यक्रिया करवानी आवश्यक हो तो शल्यक्रिया ही एक उपाय है जिससे कुछ सीमा तक वृद्धि सम्भव। ब्रेस्ट आग्मेण्टेशन सर्जरी (Breast Augmentation Surgery) में भी कई जोख़िम रहते हैं, जैसे कि रक्तस्राव, संक्रमण इत्यादि।

3. योनि सँकरा करने वाले :

कई लोगों, विशेष रूप से अविवाहित युवकों को यह भ्रम होता है कि पत्नी की योनि में कसावट का अर्थ सुख में वृद्धि है जबकि वास्तव में वहाँ ढीला या टाइट जैसा प्रायः कुछ नहीं होता, यदि कोई गम्भीर स्थिति हो तो पत्नी के दोनों पैर परस्पर सटाकर कसावट लायी जा सकती है अथवा शल्यक्रिया आवश्यक, वास्तव में ढीलापन होगा तो पति के पक्ष में होगा क्योंकि शिष्न कम कड़क रूप में भी प्रवेश कर सकेगा, अन्यथा मुड़-मुड़ जाने अथवा फिसल जाने की आशंका रहती है।

योनि में कसावट लाने के जेल्स, शल्य चिकित्सा इत्यादि से एलर्जी, संक्रमण, आन्तरिक क्षाराम्लस्तर (PH) में परिवर्तन सम्भव, इस अंग को स्वस्थ रखने में सहायक जीवाणु नष्ट होने की भी आशंका उत्पन्न हो जाती है।

अण्डाशय व अंतःस्रावी तन्त्र पर भी प्रभाव पड़ने का जोख़िम है। यौन-संक्रमणों के अनेक लक्षण दब सकते हैं यदि यौन-क्रीम्स इत्यादि लगाये जा रहे हों, इस प्रकार रोग-फैलाव और आसान हो जाता है। यौनस्वास्थ्य के लिये धूम्र व मद्यपान से दूर रहना जरूरी है।

4. शिष्नवर्द्धक लोशन व उपकरणादि :

वास्तव में शिष्न उत्तेजित अवस्था में 2-3 इन्च का काफ़ी रहता है, इससे कम भी पर्याप्त हो सकता है परन्तु Internet ने लोगों की सोच भयानक स्तर पर दूषित करके रखी है, वास्तव में Penis यदि बहुत छोटा हो तो शल्यक्रिया करके उसका आकार कुछ बढ़ाने का प्रयास किया जा सकता है.

वैसे अपर्याप्त आकार का शिष्न 1 प्रतिशत से भी कम पुरुषों में पाया गया है। वास्तव में शिष्न बड़ा होने के कई नुकसान झेलने पड़ते हैं, पत्नी को सुख कम, दर्द अधिक होता, उसमें योनि-संक्रमण की आशंका बढ़ती, वह सम्बन्ध के प्रति अनिच्छुक हो सकती। शिष्न प्रवेश के समय मुड़ सकता या फिसल सकता।

शिष्न-आकार बढ़ाने का दावा करने वाले उत्पाद इस इच्छा को तो पूर्ण नहीं कर सकते परन्तु कुछ से शिष्न को स्थायी क्षति तक पहुँच सकती है, विटामिन्स, खनिज, जड़ी-बूटियों अथवा हार्मोन्स वाली पिल्स व लोशन्स से लेकर वेक्यूम पम्प्स तक सूजन ला सकते हैं, अस्थायी प्रभाव जैसा कुछ लग सकता है परन्तु वास्तव में निष्प्रभावी रहते हैं एवं अपने साथ हानियों की कतार लेकर चल रहे होते हैं।

शिष्न के इलास्टिक ऊतक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, शिष्न की उत्तेजना की कड़ाई कम हो सकती है। शिष्न को विभिन्न ‘Exercise’ के नाम पर इधर-उधर घुमाने अथवा किसी निर्धारित तरीके से मोड़ने अथवा अथवा हाथ अथवा यंत्रों से खिंचाव इत्यादि से भी कोई लाभ तो नहीं होना, बस स्कॅर (चोटिल ऊतक-समूह) का निर्माण हो सकता है.

पीड़ा व रूप-विकृति सम्भव। शल्यचिकित्सा से अवश्य अधिकतम एक सेण्टीमीटर लम्बाई बढ़ाने का प्रयास किया जाता रहा है परन्तु यह भी जोख़िमपूर्ण है एवं हो सकता है कि उत्तेजित लम्बाई में तनिक भी असर न दिखे।

शल्यक्रिया से संक्रमण, स्केरिंग, संवेदन अथवा क्रियात्मकता की हानि सम्भव। सस्पेन्सरी लिगामेण्ट शल्यक्रिया साधारण उन पुरुषों में की जाती है जिनका शिष्न किसी जन्मजात विकार अथवा चोट के कारण सामान्य क्रियाशील न हो।

अतिआपात्काल न होने पर भी ऐसी कोई शल्यचिकित्सा कराने से स्थायी हानि हो सकती है। सस्पेन्सरी लिगामेण्ट से शिष्न को जघनास्थि (प्यूबिक बोन) से जोड़ा जाता है एवं उदर से त्वचा शिष्नाधार (Penile Shoft) से जोड़ दी जाती है।

जब इस लिगामेण्ट को काट दिया जाता है तो यह लम्बा दिखायी पड़ता है क्योंकि इसकी लटकन अधिक होती है। ध्यान रहे कि सस्पेन्सरी लिगामेण्ट काटने से उत्तेजित शिष्न अस्थिर हो सकता है।

काटकर अलग किये सस्पेन्सरी लिगामेण्ट को कभी-कभी अन्य कार्यविधियों से जोड़ दिया जाता है, जैसे कि जघनास्थि से अतिरिक्त वसा को हटाते हुए। शिष्न को मोटा करने की प्रक्रिया में शरीर के माँसल भाग से वसा लेकर शिष्नाधार के भीतर प्रवेश करा दिया जाता है।

परिणाम निराशाजनक हो सकता है क्योंकि भीतर उतारा गया वसा हो सकता है कि शरीर द्वारा पुनः अवशोषित कर लिया जाये। इससे शिष्न में टेढ़ापन आ सकता है अथवा उसकी आकृति में असममिति आ सकती है एवं आकृति अनियमित दिख सकती है। मोटाई बढ़ाने के एक अन्य तरीके में शिष्न के आधार में ऊतक ग्राफ़्ट कर दिया जाता है।

इनमें से कोई तरीका न तो सुरक्षित है, न प्रभावी बल्कि अन्य समसयाओं साथ उत्तेजना आने में व्यवधान और पड़ सकता है। वास्तव में शिष्न पतला लगने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि कमर पर चर्बी जमा होना अथवा तोंद। अब तो मान जाइए कि वास्तव में पत्नी को प्रेम से प्रसन्न किया जा सकता है, शिष्न की मोटाई-लम्बाई से नहीं।

5. दाग-धब्बे हटाने के अथवा गोरेपन के दावे :

प्रकृति द्वारा मिलॅटानिन हार्मोन के माध्यम से मानव-त्वचा में मिलैनिन नामक एक नैसर्गिक वर्णक (पिग्मेण्ट) को नियन्त्रित रखा जाता है। यह वर्णक त्वचा के लिये कई प्रकार से जरुरी है एवं न तो यह कोई विकृति है, न ही इसे किसी तथाकथित औषधि से हटाया जा सकता है।

6. शारीरिक ऊँचाई बढ़ाने मोटापन घटाने-बढ़ाने के उत्पाद :

वास्तव में ऊँचाई मुख्यतः आनुवंषिक विषय है, फिर भी लटकने, कूदने जैसी गतिविधियों से शरीर व हड्डियों में खिंचाव लाकर एवं पोषण आहार द्वारा कुछ प्रयास अवश्य किया जा सकता है परन्तु कोई खाद्य-पेय विशेष इत्यादि अथवा अन्य उत्पादों द्वारा शरीर की ऊँचाई न तो बाल्यावस्था, न किशोरावस्था, न ही बाद में बढ़ायी जा सकती है।

यदि बहुत पहले ही कोई हार्मोनल समस्या पता चल गयी हो तो भी उस सम्बन्धित हार्मोन के इंजेक्शन देकर ऊँचाई की गति बढ़ाने के प्रयास समय रहते किये जा सकते हैं परन्तु केवल प्रयास तथा दुष्प्रभाव भी पड़ेंगे ही।

तोंद व मोटापे को घटाने का आलेख हमारे Website पर पढ़ें तथा मोटापा बढ़ाने से पहले यह देखना होगा कि क्या वास्तव में व्यक्ति इतनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है कि उसे कुपोषित अथवा असामान्य कहा जा सके अथवा वह दुबला मात्र दिखता है.

वास्तव में ऊर्जा व रक्त परीक्षणों में सब सामान्य है। यदि असामान्य हो तो सम्बन्धित पोषक की कमी पूरी करके स्थिति सामान्य की जा सकती है। सोयाबीन, मशरूम, दाल व फलीदार आहार को बढ़ाना ही नैसर्गिक व हानिरहित उपाय है।

7. बाडी-बिल्डिंग, जिमिंग अथवा स्टॅरायड्स :

आजकल इस दिखावे के युग में आकर्षक दिखने की चाह में व्यक्ति जाने क्या-क्या करता रहता है, यह सब ऊर्जा यदि कुछ सकारात्मक करने में लगाये तो कितना अच्छा हो। स्टरायड्स से शुक्राणु संख्या घटती है एवं नपुंसकता की भी आशंका उत्पन्न हो जाती है। वृषणों का सिकुड़ना, रक्तचाप, पुरुष-बाँझपन, मासिक समस्याएँ अथवा स्त्रियों जैसे स्तन पुरुषों में विकसित होने एवं कुछ मनोविकारों जैसे लक्षण सम्भव।

जिमिंग इत्यादि की विभिन्न गतिविधियों से मानव के पेशीय-कंकाल (मस्क्युलो-स्केलेटल) व पाचन तन्त्र पर विपरीत प्रभाव पड़ते हैं जिससे जठरान्त्र (पेट व आँत) की समस्याएँ, हृद्वाहिका (कार्डियोवेस्क्युलर)-विघ्न, प्रतिरक्षा-तन्त्र में व्यवधान, कामेच्छा में कमी इत्यादि की सम्भावना बढ़ती है। सर्वश्रेष्ठ तो प्राकृतिक रीतियों में शारीरिक सक्रियता बढ़ायें, रस्सी कूदें, स्वच्छ वायु में साईकल चलायें, सीढ़ियाँ चढ़ें इत्यादि।

मस्क्युलर दिखने का अर्थ स्वस्थ होने से नहीं होता, न ही ग़ैर-मस्क्यूलर होने का अर्थ अस्वस्थ होना। कई बाडी बिल्डर्स व जिम-जंकीज़ का स्वास्थ्य ख़राब रहता है, ये बाहर से ‘फ़िट’ नज़र आ सकते हैं परन्तु भीतर से स्वस्थ नहीं हैं।

कई बाडी बिल्डर्स में डिस्बायोटिक माइक्राबायोटा हो जाता है जिसमें शरीर में हानिप्रद व लाभप्रद सूक्ष्मजीवों में असंतुलन हो जाता है। जिमिंग करने वाले लोगों में दीर्घकालिक सूजन भी रहती है। हृदय-स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है।

संधियों, कण्डरा (टेण्डन) व लिगामेण्ट्स पर दबाव पड़ता है। परिणाम स्वरूप कण्डराशोथ (टेण्डन में सूजन), पीठदर्द, कंधों में पीड़ा एवं अन्य संधि-समस्याएँ हो सकती हैं।

इन समस्याओं का उपचार समय रहते न कराया तो स्थिति जस की तस बनी रहेगी एवं बाद में बिगड़ जायेगी। समय बीतने के बाद बुढ़ापे में अथवा युवावस्था में ही स्थितियों का स्पष्ट रूप से बिगड़ना अनुभव किया जा सकता है। संधियों (जोड़ों) में सायनोवियल तरल कम बनने लगता है एवं शारीरिक गति के दौरान आन्तरिक चिकनाई पहले जितनी नहीं रह जाती।

इस कारण जोड़ों में घर्षण व इस प्रकार कष्ट होता है। विभिन्न Gyming गतिविधियों से मेरुदण्ड में ज़ोर पड़ता जाता है एवं इस प्रकार इन्वर्टिबल डिस्क्स दबती जाती हैं। उम्र बढ़ने के सापेक्ष हमारी डिस्क्स वैसे भी कमज़ोर पड़ती जाती हैं किन्तु Body Building के मोह में यह स्थिति शीघ्र व और ख़राब रूप में आती है। डिस्क में विकृति आने की गति बढ़ जाती है। यकृत तो शरीर का फ़िल्टर है जो सप्लिमेण्ट्स से क्षतिग्रस्त होने लगता है।

क्रियेटिनिन के कारण यकृत को अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ जाता है एवं यदि पानी कम पिया तो क्षति और बढ़ जाती है। जितने अधिक Supplements, Protein व Multi – vitamins का सेवन किया जा रहा होगा अभी व भविष्य में उतनी अधिक हानि पहुँचेगी।

जिमिंग करने वालों की पेशियाँ धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती हैं एवं पेशीय अपोषण अर्थात् मस्सल-एट्राफ़ी की गति व गम्भीरता बढ़ती जाती है। किसी भी सूक्ष्म अथवा बृहत् पोषक तत्त्व को सप्लिमेण्ट अथवा अन्य रासायनिक रूपों में लेना और अधिक हानिप्रद रहता है, वैसे भी हर समय हम रक्त की नाप-तौल नहीं कर रहे हो सकते।

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