प्रोटीन्स का महत्त्व, कमियाँ एवं पूर्ति Benefits Of Proteins Disadvantage In Hindi

प्रोटीन्स का महत्त्व, कमियाँ एवं पूर्ति Benefits Of Proteins  Disadvantage In Hindi

Benefits Of Proteins Disadvantage In Hindi

प्रोटीन्स अमीनो अम्लों के परस्पर जुड़ने से बनी लम्बी शृंखलाएँ हैं। मानव-शरीर में आवश्यक 20 अमीनो अम्ल परस्पर विभिन्न प्रकारों से जुड़-जुड़कर हज़ारों प्रकार के प्रोटीन्स का निर्माण करते हैं। इस आर्टिकल में हम प्रोटीन्स की कमी के कारणों व पूर्ति के स्रोतों का भी उल्लेख करने जा रहे हैं.

Benefits Of Proteins Disadvantage In Hindi

Benefits of protein
Benefits of protein

प्रोटीन्स का महत्त्व :

1. बढ़त व रखरखाव – मसल्स की टूट-फूट मरम्मत व वृद्धि के लिये।

2. जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं के संचालन में – बहुत सारे विकर (एन्जाइम्स) प्रोटीन्स होते हैं जो cells के भीतर व बाहर अन्य पोषक तत्त्वों के साथ मिलकर ढेरों जैव रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायता करते हैं।

3. पाचन में सहायक – cells के बाहर कार्य करने वाले विकरों (एन्ज़ाइम्स) में लॅक्टेज़ व सुक्रेज़ सम्मिलित हैं जो शर्करा के पाचन में सहायता करते हैं।

4. रुधिर-स्कन्दन – शरीर से बहते ख़ून को थक्का जमाकर रोकने में सहायक.

5. पेशीय संकुचन ताकि हृदय व अन्य अंगों की पेशियाँ अपने कार्य सुचारु रूप से कर पायें.

6. दूत के रूप में – कुछ प्रोटीन्स हार्मोन्स होते हैं जो कि ऐसे रासायनिक दूत हैं जो cells, मसल्स व अंगों के मध्य संवाद में सहायता करते हैं। ये अंतःस्रावी (एण्डोक्राइन) ग्रंथियों द्वारा स्रावित होते हैं एवं रुधिर के माध्यम से लक्ष्य-अंगों में पहुँचा दिये जाते हैं जहाँ वे कोशिका-सतह पर प्रोटीन-ग्राहियों से जुड़ जाते हैं।

हार्मोन्स को तीन मुख्य वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं
1. प्रोटीन व पेप्टाइड्स
2. स्टेरायड्स
3. एमाइन्स (ये ट्रिप्टोफ़ेन अथवा टायरोसिन जैसे किसी एक अमीनो अम्ल से बनते हैं).

हार्मोन्स के उदाहरण – इन्स्युलिन (ग्लुकोज़ अथवा शर्करा को ले जाने का संकेत कोशिका में पहुँचाना), ग्लुकागोन (यकृत में संचित ग्लुकोज़ के खण्डन का संकेतन), ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन (अस्थियों सहित विभिन्न मसल्स की बढ़त को प्रेरित करना), एण्टीडाइयूरेटिक हार्मोन (जल को पुनः अवशोषित करने का संकेत वृक्कों को भेजता है), एड्रिनोकार्टिकोट्रापिक हार्मोन – यह उपचयापचय (मेटाबालिज़्म) में मुख्य कारक कहलाने वाले कार्टिसोल के निकलने को प्रेरित करता है।

7. ढाँचा प्रदान करना – कुछ प्रोटीन्स तन्तुमय (रेशेदार) होते हैं जिनसे cells व मसल्स को दृढ़ता व मजबूती मिलती है। इन प्रोटीन्स में किरैटिन, कोलेजन व इलास्टिन सम्मिलित हैं जो शरीर में कुछ संरचनाओं का संयोजी ढाँचा बनाने में सहायक हैं। किरैटिन ऐसा संरचनात्मक प्रोटीन है जो त्वचा, केश व नाखूनों में पाया जाता है।

कोलेजन अस्थियों, टेण्डन्स, लिगामेण्ट्स व त्वचा का संरचनात्मक प्रोटीन है। इलास्टिक कोलेजन की अपेक्षा सैकड़ों गुना लचीला होता है। इस लचीलेपन के कारण शरीर में गर्भाशय, फेफड़े व धमनियों जैसे ऊतक खिंचाव व संकुचन के बाद अपनी मूल आकृति में लौट पाते हैं।

8. क्षाराम्लस्तर बनाये रखने में – रुधिर व अन्य दैहिक तरलों में अम्लों व क्षारों के उपयुक्त सान्द्रणों का नियमन करने में प्रोटीन्स बड़ी भूमिका निभाते हैं। अम्लों व क्षारों के मध्य के संतुलन को पीएच पैमाने पर मापा जाता है जो कि 0 से 14 तक होता है जिसमें 0 सबसे अम्लीय व 14 सबसे क्षारीय है। आमाशय के अम्ल का क्षाराम्लस्तर 2 व मानव-रक्त का क्षाराम्लस्तर 7.4 होता है।

क्षाराम्लस्तर को विनियमित रखने में हीमोग्लोबिन महत्त्वपूर्ण है जो लौह युक्त ऐसा प्रोटीन है जिससे लालरक्त कोशिकाएँ बनी होती हैं। हीमोग्लोबिन अम्ल की छोटी मात्राओं से जुड़ता है एवं रक्त के सामान्य क्षाराम्लस्तर को बनाये रखने में सहायता करता है।

9. तरल-संतुलन – तरलों का संतुलन बनाये रखने के लिये प्रोटीन्स द्वारा दैहिक प्रक्रियाओं का नियमन किया जाता है। एल्ब्युमिन व ग्लोब्युलिन रुधिर के ऐसे प्रोटीन्स है जो शरीर का तरल-संतुलन बनाये रखने के लिये जल को आकर्षित करते व थामे रखते हैं। भोजन में पर्याप्त प्रोटीन्स न हों तो एल्ब्युमिन व ग्लोब्युलिन के स्तर धीरे-धीरे घटते चले जाते हैं, परिणाम स्वरूप ये प्रोटीन्स रुधिर-वाहिकाओं में रुधिर को रोके नहीं रख पाते जिससे रुधिर cells के मध्य के अन्तरालों से होकर गुजरने लगता है।

इस कारण रुधिर व अन्य तरल भराव जनित सूजन (एडेमा) होने लगती है, विशेषतया आमाशय के क्षेत्र में जलोदर की स्थिति। यह गम्भीर प्रोटीन-कुपोषण का रूप है जिसे क्वाषियोर्कर कहा जाता है जो तब विकसित होता है जब व्यक्ति पर्याप्त कैलोरी का सेवन तो कर लेता है परन्तु पर्याप्त प्रोटीन का सेवन नहीं करता। प्रोटीन रुधिर में रुधिर व आसपास के मसल्स के मध्य तरल-संतुलन को बनाये रखता है।

10. प्रतिरक्षातन्त्र को सँभालें – प्रोटीन्स इम्युनोग्लोब्युलिन्स अथवा प्रतिरक्षियों का निर्माण करते हुए संक्रमण से लड़ते हैं। प्रतिरक्षी (एण्टिबाडीज़) रुधिर में ऐसे प्रोटीन्स हैं जो जीवाणुओं व विषाणुओं जैसे हानिप्रद आक्रमणकारियों से शरीर को बचाते हैं। जब भी कोई हानिप्रद सूक्ष्मजीव शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर प्रतिरक्षियों का उत्पादन करने लगता है जो इन बाहरी तत्त्वों को खदेड़ने के लिये चुन लेते हैं। ये प्रतिरक्षी समय पर न बनें तो बाहर से भीतर आये रोगकारक सूक्ष्मजीव सरलता से शरीर में रहने लग जायें व रोग उत्पन्न होने लगें।

11. पोषकों का परिवहन – कुछ प्रोटीन्स परिवहन-प्रोटीन होते हैं जो शरीर के भीतर अथवा भीतर से बाहर किसी पोषक का आवागमन कराते हैं; इन पोषकों में विटामिन्स, खनिज, रुधिर-षर्करा, कोलॅस्टेराल व आक्सीजन भी सम्मिलित हैं, जैसे कि हीमोग्लोबिन ऐसा प्रोटीन है जो फेफड़ों से आक्सीजन को अन्य शारीरिक मसल्स तक ले जाता है।

ग्लुकोज़-ट्रांस्पोर्टर्स ग्लुकोज़ को cells में ले जाते हैं जबकि लिपोप्रोटीन्स द्वारा कोलेस्टेराल व अन्य वसाओं को रुधिर में ले जाया जाता है। प्रोटीन-ट्रांस्पोर्टर्स विशिष्ट होते हैं, अर्थात् ये विशिष्ट पदार्थों से ही जुड़ते हैं। ग्लुकोज़ ले जाने वाला प्रोटीन-ट्रांस्पोर्टर कोलेस्टॅराल को नहीं ले जाने वाला।

12. पोषकों का भण्डारण – प्रोटीन्स द्वारा भण्डारण-भूमिका भी निभायी जाती है। फ़ेरिटिन ऐसा भण्डारण-प्रोटीन है जो लौह का भण्डारण करता है।

13. ऊर्जा-उत्पादन – कार्बोहाइड्रेट, वसा व प्रोटीन से शरीर को ऊर्जा मिलती है परन्तु सामान्य परिस्थितियों में ऊर्जा-आवश्यकता पूर्ण करने में प्रोटीन सीमित भूमिका निभाता है। 18-48 घण्टे बिना खाये रहने अथवा खाने पर उल्टी हो-हो जाने अथवा खाते से ही अपच से पतले दस्त में सब बिना पचे निकल जाने जैसी स्थितियों में शरीर का प्रोटीन कंकाली पेशियों से खण्डित होकर अमीनो अम्लों में परिवर्तित होने लगता है ताकि आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जा सके।

शरीर में कार्बोहाइड्रेट का भण्डार कम होने पर भी इसी प्रकार कंकाली पेषियों से अमीनो अम्लों के विखण्डन द्वारा ऊर्जा मिलती है, भूखे रहकर अतिरेक शारीरिक श्रम करने अथवा पर्याप्त कैलोरी का सेवन न करने से भी ऐसी स्थिति आती है।

प्रोटीन की कमी कब ?

प्रायः शरीर अपनी आवश्यकता के लिये भोजन में प्राप्त होने वाले प्रोटीन्स का उपयोग कर लेता है परन्तु कुछ स्थितियों में शरीर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये शरीर में ही संचित प्रोटीन्स का दोहन करने लगता है, जैसे कि –

*. गर्भावस्था में
*. चोट-मोच में
*. शल्यक्रिया में
*. वयोवृद्धों में
*. इर्रिटेबल बाउल सिण्ड्रोम या ऐसी पाचन सम्बन्धी विकृतियों में जब आहार के माध्यम से प्राप्त प्रोटीन्स शरीर में किसी कारणवश पर्याप्त रूप में अवशोषित न हो पाते हों
*. धावकों व तथाकथित बाडी-बिल्डिंग, जिमिंग करने वालों में (ध्यान रहे कि तथाकथित जिमिंग/बाडी-बिल्डिंग कई सन्दर्भों में अत्यन्त हानिप्रद है, अत: साईकल चलाते, रस्सी कूदते हुए नैसर्गिक रूप से सक्रिय रहें एवं पोषक संतुलित शाकाहार सेवन किया करें)

प्रोटीन के स्रोत –

1. फलीदार , जैसे कि दालें, मटर, सेम इत्यादि।

2. गिरियाँ

3. बीज

4. साबुत मोटे अनाज, विशेष तौर पर छिलका युक्त देसी अनाज

5. मशरूम

6. दुग्ध व दुग्धोत्पाद

7. सोयाबीन उत्पाद

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