सेक्स की लत से होने वाली 31 बड़े नुकसान

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सेक्स की लत से होने वाली 31 सुनिश्चित हानियाँ व नुकसान 31 Harmfull Side Effect Of Sex In Hindi

सेक्स की लत से होने वाली 31 बड़े नुकसान 31 Harmfull Side Effect Of Sex In Hindi

वैसे तो सेक्स से हानियों की संख्या सैकड़ों में होगी परन्तु यहाँ पर सुनिश्चित हानियों में से ही कुछ हानियाँ लिखी जा रही हैं. हो सकता है कि आजकल के कुछ युवाओं को यह बात सुनने में कुछ अजीब लगे लेकिन सच्चाई यही है कि कलयुग में बुरे को अच्छा व अच्छे को बुरा साबित करने में लोग लगे रहते हैं.

वैसे तो विवाहेतर व विवाहपूर्व एवं अप्राकृतिक सेक्स बहुत ज़्यादा बुरा व हर प्रकार से जोख़िमपूर्ण होता ही है लेकिन पति-पत्नी के सेक्स को भी पूरी तरह बेदाग, लाभप्रद या हानिरहित नहीं कह सकते.

31 Harmfull Side Effect Of Sex In Hindi

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इसलिये हम आपके लिये सेक्स से जुड़ी सच्चाइयों के आइने उठाकर लायें हैं कि सेक्स रूपी क्षणिक, नश्वर सांसारिक इस तथाकथित सुख से हानियाँ कितनी अधिक एवं सुनिष्चित होती ही हैं :

1. रचनात्मकता का नाश :

जिस व्यक्ति के मन में भी सेक्सुअल छींटें पड़ जायें वह लगभग 3-4 दिनों तक कुछ अच्छा प्रायः नहीं सोच पाता। सकारात्मकता तो टूटी बोतल में रेत जैसी निकल जाती है।

2. मानसिक व शारीरिक एनॅस्थीशिया :

सेक्स से सम्बन्धित कोई भी बात देखने, करने व सोचने से भी व्यक्ति का तन और मन एक नशेड़ी जैसी स्टेज में चला जाता है, उसे अपने आसपास या अपने आप तक की सुधबुध नहीं रहती, यह भी एक कारण है जिससे कामांधत्व (सेक्सुअल ब्लाइंडनेस) आता है।

जैसे कि ब्ल्यू फ़िल्म देखने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे लोकलाज तक भूलने लगता है, उसे यह ग़लत काम भी ‘आम’ या सामान्य लगने लगता है, उसके चाल-चलन और ज़्यादा बहकने लगते हैं.

अब वह अपना अंग प्रदर्शन तक करने में संकोच कम करेगा, सेक्स के दौरान और इससे पहले व बाद में कुछ मिनट्स से लेकर घण्टों तक स्त्री-पुरुष अपनी ज़िम्मेदारियों तक से पल्ला झाड़ने लगते हैं; बच्चा बाजू के कमरे में रो रहा हो तो भी उनपर तो सेक्स ख़तम कर स्खलन करने का भूत चढ़ा होता है।

3. जाँघ व कमर में दर्द सहित तन्त्रिका-तन्त्र में गड़बड़ :

सेक्स के दौरान तन्त्रिका तन्त्र सहित अन्य तन्त्रों में विकृतियाँ आने लगती हैं एवं कई अंगों में दर्द भी होता है परन्तु एनॅस्थीषिया जैसी स्थिति होने के कारण उसे कुछ अनुभव नहीं हो पाता।

4. ब्रह्मचर्य-भंग :

समस्त इन्द्रियों को नष्वर जगत् से हटाकर ब्रह्म अर्थात् परमात्मा में एकाग्र करना ब्रह्मचर्य है। कामुकता से बरसों का ब्रह्मचर्य क्षणभर में भंग हो जाता है।

5. हिंसा :

जैन, बौद्ध अथवा हिन्दू अथवा किसी भी धर्म-सम्प्रदाय अथपा पंथ या फिर वैज्ञानिक रूप से क्यों न समझने का प्रयास करें, हर नज़र से हर प्रकार के सेक्स के हर रूप में हिंसा ही हिंसा की प्रधानता नज़र आयेगी, हस्तमैथुन तक में व्यक्ति वीर्य के माध्यम से लाखों-करोड़ों सूक्ष्म शुक्राणुओं को कचरे में डाल देता है।

यौन सम्पर्क में जनन अंगों की विभिन्न पेशीय व अन्य कोशिकाएँ रगड़न व गर्माहट इत्यादि से नष्ट हो जाती हैं। दोनों पक्षों को पीड़ा होती है सो अलग। इस शारीरिक घर्षण से दोनों के शरीर पर पाये जाने वाले न जाने कितने सूक्ष्मजीव भी मौत के मुँह में समा जाते हैं, तुच्छ मज़े के चक्कर में कइयों की सज़ा।

6. कीचड़ में और उतरने की इच्छा :

पेट व काम की अग्नि बुझाये नहीं बुझती; इसकी ओर व्यक्ति जितना बढ़ेगा आग में घीं डाल रहा होगा, आगे और ! आगे और !! की मृग-मरीचिका इसे माया में भटकाती जायेगी।

7. योनि सम्बन्धी संक्रमण एवं दोनों पक्षों को मूत्रपथ संक्रमण :

वास्तव में नर-मादा दोनों के अंग मूल रूप से मूत्रत्याग हेतु बने होते हैं जिनको विपरीत दिशा में सरकाने, गति कराने व ऐसा कोई भी प्रयास करने से विशेष रूप से योनि व गर्भाशयी ग्रीवाः सर्विक्स सहित शिष्न की मूत्रनली में संक्रमण होते रहते हैं जिनका एक कारण रगड़न व खुरचन से कोशिकाओं व पेशियों को क्षति पहुँचना भी है। इसी के साथ वायु में तैर रहे रोगाणु भी भीतर आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।

8. स्त्री शरीर में विचित्र गैस बनना :

शिष्न के प्रवेश से स्त्री शरीर में पेट में योनि के भीतर गैस बनती है जिसे योनिद्वार से निकलते कभी-कभी अनुभव तक किया जा सकता है।

9. लिंग के माँस को नुकसान :

लिंग केवल माँस का लोथड़ा होता है जो मूत्र त्यागने के लिये बना है, मथनी या मूसल जैसा प्रयोग करेंगे तो इसकी माँसपेशियाँ व धमनियाँ धीरे-धीरे दम तोड़ती जाती हैं, छुपी हुई (बिना जानकारी के लगी) हर आन्तरिक चोट की रिकवरी सम्भव नहीं होती।

10. वृषणों को नुकसान :

शुक्रवाहिकाएँ या वीर्य वाहिनी नलियाँ वीर्य को बाहर ढकेलने से हर बार लगभग 10 मील प्रति घण्टा की चाल से स्खलन के दौरान आन्तरिक खुरचन का शिकार होती हैं एवं क्षत-विक्षत होती जाती हैं।

11. व्रत-उपवास व तपोबल की हानि :

व्रतोपवास के दौरान एवं तीर्थस्थल में हमेशा से सेक्स के बारे में सोचना भी सख़्ती से निषिद्ध रहता है क्योंकि बात सीधी-सी है, सेक्स-विचार मन को भी अपवित्र करते हैं।

12. हृद्वाहिका तन्त्र (कार्डियोवॅस्क्युलर सिस्टॅम) पर बोझ :

रक्त को गोपनीय अंगों तक लगातार अधिक से अधिक पहुँचाने के लिये हृदय अधिक रक्त पम्प करने को मजबूर रहता है जिससे धमनियों, शिराओं और समूचे हृदय पर अनावश्यक ज़ोर पड़ता है।

13. संचित मूत्र से विषाक्त अवशोषण :

उत्तेजनावश मूत्रवेग का ध्यान नहीं रहता एवं मैथुन के बाद भी जल्दी ही सहज मूत्रोत्सर्ग सम्भव नहीं होता जिससे मूत्र मूत्राशय में ही भरा रहता है जिससे उसके कुछ विषाक्त तत्त्व शरीर में ही सोख लिये जाते हैं।

14. गर्भधारण व संक्रामक रोगों इत्यादि की आशंका हमेशा बरकरार :

निरोध वास्तव में सुरक्षा की गारण्टी नहीं हो सकती, और वैसे भी यह पूर्ण अपारगम्य (जिसके पार कुछ न जा सके) नहीं होती। बहुत सारे रोगप्रद सूक्ष्मजीव ऐसे होते हैं जो दषकों तक बिना लक्षण दिखाये मानव-शरीर में डेरा जमाये रह सकते हैं एवं बड़ी आसानी से निरोध को पार कर सकते हैं।

वैसे भी आजकल कई नये-नये रोग भारी संख्या में जन्म ले रहे हैं एवं बहुत पहले कई देशो में समाप्त घोषित किये जा चुके रोगकारक भी अब अधिक प्रतिरोधी व ढीठ रूप में सामने आ रहे हैं तथा मानव-समाज का खान-पान, रहन-सहन व सम्पूर्ण माहौल भी इतना मिलावटी, कृत्रिम व ख़राब हो चुका है कि यदि ढंग से विस्तृत जाँचें करायी जायें तो स्वस्थ लग रहे अधिकांश व्यक्तियों में कई घातक संक्रमण सामने आयें तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

15. सार्थकता से दूरी :

सेक्स में रत् व्यक्ति समय, श्रम, धन व ऊर्जा को किसी जनकल्याण अथवा सर्वजीववहित के कार्य में लगाने की नहीं सोचता।

16. सर्वथा अनुपयोगी कृत्य :

सेक्स में डोपामाइन हार्मोन रिलीज़ होता है ( जो कि नशा लाने वाला या भ्रमित करने वाला हार्मोन भी कहलाता है ). सेक्स के दौरान इसके निकलने से व्यक्ति इसी गतिविधि में लिप्त रहने को या फिर से सेक्स दोहराने को अच्छा, रोचक, आकर्षक मानने लगता है, वह विचार ही नहीं करता कि इस गतिविधि में कुछ नहीं रखा। वास्तव में सेक्स है बिल्कुल मीनिंगलेस।

17. वास्तव में जीवन के महत्त्वपूर्ण विषयों से मन का भटकाव :

सेक्स में लगा या डूबा व्यक्ति अपने व उस व्यक्ति की शिक्षा, आजीविका, आपसी सम्बन्ध, जीवन-दिशा व लक्ष्य सहित घर, आर्थिक-सामाजिक स्थिति, चरित्र, भविष्य इत्यादि के बारे में नहीं सोचता।

18. हीनभाव व असंतोष का बोलबाला :

यदि किसी बार संतुष्ट न कर पाये तो हीनभाव, संतुष्ट न हो पाये तो असंतोष, अर्थात् हर प्रकार से हर बार किसी-न-किसी द्वंद्व में डोलता ही रहेगा।

19. राग, द्वेष, ईर्ष्या :

सेक्स में व्यक्ति से जुड़ाव या लगाव हो जाता है, चाहत पूरी न हो द्वेष हो जाता है एवं रूप-रंग इत्यादि में तुलना से एक-दूसरे व अन्य से ईर्ष्या की जाने लगती है। इन कारणों से भी नवविवाहित दम्पति शुरु के दिनों में ख़ुश लगते हैं एवं फिर उनमें दूरियाँ आने लगती हैं।

20. संदेह :

जैसे कि बोरियत इत्यादि बहाने बनाकर विवाहेत्तर सम्बन्ध, ‘इसे कोई और पसन्द है’,’कहीं यह झूठी संतुष्टि तो नहीं दर्शा रहा या रही’ इत्यादि।

21. स्वार्थ, क्रोध, निराशा व अहं हावी होना :

मैं संतुष्ट करके रहूँगा’, ‘मैं हार नहीं सकता’, ‘मुझे संतुष्ट करना या मेरे बोले तरीके से सेक्स करना इसका फ़र्ज़ है’ जैसे भाव ज़हर बन जाते हैं।

22. कैलोरी व पोषक तत्त्वों का हृास तथा आक्सीजन की कमी एवं समग्र थकावट सहित शरीर के अन्य अंगों पर बढ़ता दबावः कई मकड़ियों के बारे में डिस्कवरी या एनिमल प्लानेट वगैरह पर सुना होगा कि मैथुन के बाद मकड़ी अपने नर को खा जाती है (तर्क यह कि मेरे अण्डों व उनसे होने वाले बच्चों को बैठे-बिठाये फ्ऱी में पोषण मिलेगा); कुछ-कुछ ऐसा ही मनुष्यों में स्त्री व पुरुष दोनों पर लागू होता है.

वीर्य के साथ बहुत सारे पोषक तत्त्व शरीर से बाहर फेंक दिये जाते हैं (वर्ना ये तो शरीर के भीतर ही फिर से अवशोषित हो जाते), दोनों की ख़ूब कॅलोरी खपती है, रक्तचाप बढ़ता है, धड़कन तेज हो जाती है.

विशेष रूप से रक्त-संचार में ग्लुकोज़ व आक्सीजन दोनों की कमी हो जाती है क्योंकि समस्त शारीरिक व मानसिक इत्यादि ऊर्जाएँ गुप्त अंगों की भरपायी में खप जाती हैं एवं मस्तिष्क व अन्य अंगों में पर्याप्त रक्त नहीं पहुँच रहा होता है एवं जितना पहुँच रहा होता है उसमें भी आक्सीजन इत्यादि आवष्यक तत्त्वों की कमी रहती है एवं कार्बन डाईआक्साइड इत्यादि उत्सर्जी व हानिप्रद तत्त्वों की भरमार रहती है।

23. पूर्व तैयारी सहित निद्रा व आराम में समय का नाश :

तीसरे की नज़र से बचने व भीड़ से दूर होने सहित एक-दूसरे को मानसिक रूप से तैयार करने एवं सेक्स के बाद थकान मिटाने या ढीले पड़ चुके शरीर में आलस्यवश भी नींद आने या घर-बाहर के सामान्य कामकाज करने से पहले ऊर्जा जुटाने के नाम पर आराम करने में समय का भारी नाश होता है।

24. कार्य-उत्पादकता का घाटा :

सेक्स में सक्रिय लोगों की घर व कार्यालय में उत्पादकता, उत्कृष्टता, दक्षता इत्यादि में तुलनात्मक रूप से कमी रहती है।

25. मानव से पशु व फिर क्रमिक रूप से राक्षस बनने को उकसावा :

व्यक्ति एक बार सेक्स करता है तो फिर उसके मन में अप्राकृतिक मैथुन ( जैसे गुदा, मुख अथवा समलैंगिकता वगैरह ) का ख़्याल आने लगता है, नयेपन व वैरियेशन की तलाश में वह दरिंदगी की ओर कदम कब बढ़ा देता है उसे भी शायद न पता चलता हो, जैसे कि यदि विवाहित पति-पत्नी की ही बात करें तो भी उत्तेजना के वशीभूत हुआ पति कब पत्नी के गुप्त अंगों को चोट पहुँचाने लगता है यह इन दोनों को समझ नहीं आता।

26. पारिवारिक व सामाजिक सद्भाव में अवरोध :

किसी का माता – पिता, बेटी – बेटा, भाई – बहन इत्यादि सम्बन्धी होने के बजाय यौन सम्बन्धी होने के भाव का दबदबा रहता है, बुलाने के लिये सास द्वारा आवाज़ लगाना भी मन को अखरने लगता है, वैसे भी कामवासना में घिरे शरीर में यौनसम्बन्ध वाले हार्मोन्स अधिक निकलने लगते हैं एवं बच्चों को सँभालने वाले ममत्व युक्त हार्मोन्स दब जाते हैं।

27. मानसिक व शारीरिक तनाव :

घर व कार्यालय में दिनभर मेहनत के बाद तन की थकान मिटाने के नाम पर मन को बहलाने या मन को सोकाल्ड रिफ्ऱेश करने की आड़ लेकर तन को और परेशान करने का काम Sex में होता है। इस प्रकार आख़िरकार दोनों के तन और मन दोनों और अधिक पीड़ित हो जाते हैं।

28. दुर्गन्ध व अस्वच्छता :

दोनों देहों में दुर्गंध पनपने लगती है एवं दैहिक तरलों से कमरे व बिस्तर तक में अशुद्धि व मलिनता आ जाती है। यहाँ तक कि केवल उत्तेजना के दौरान भी पूरे शरीर में अजीब दुर्गंधें आने लगती हैं।

29. विवाह का कामुकीकरण (सेक्सुअलाइज़ेशन) :

प्राचीन काल में भगवद्भक्ति के प्रचार-प्रसार एवं ईश्वरीय सिद्धान्तों व आदर्शो की स्थापना के लिये नयी पीढ़ी को पैदा करने के लिये सम्भोग व इसके लिये विवाह की रचना की गयी कि केवल धार्मिक सन्तान जनने व उसे भक्ति-प्रसार हेतु पालने के लिये सम्भोग करेंगे.

(आमतौर पर अधिक से अधिक 2-4 बार सेक्स) परन्तु वर्तमान में तो ‘भक्ति-प्रसार को मन में रखकर’ कोई विवाह नहीं करता तो फिर विवाह का क्या अर्थ रह जाता है, विवाह ही नहीं तो फिर सेक्स का भी क्या प्रयोजन ? यह तो सर्वाधिक मलीन कार्य हुआ।

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30. होड़ व दिखावटीपन :

बन-ठनकर रहने या ख़ूब तैयार होकर बाहर जाने या आकर्षक लगने की चाह व्यक्ति को ज़मीन और ज़मीर से जुड़े नहीं रहने देती।

31. पाप को भी सामान्य अथवा उचित जैसा समझ लेने का भ्रम :

सेक्स की बात आते ही व्यक्ति का विवेक दूर होने लगता है। वह अपनी स्वेच्छा से बनायी गयी सेक्स-चाहत को तर्कसंगत साबित करने की ज़िद में धार्मिक व नैतिक रूप से भी संवेदनाहीन हो जाता है एवं धर्मभ्रष्ट होकर पतित होने लगता है।

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